Chauhan
भारत का गर्वीला चौहान राजपूत राजवंश का इतिहास
भारत का गर्वीला चौहान राजपूत राजवंश का इतिहास :-
भारत के गर्वीले चौहान राजवंश का राजपूतों के 36 राजवंशों में विशेष महत्व रहा है। चौहान वंश में बड़े ही शूरवीर राजपूतों ने जन्म लिया है। चौहान राजपूत सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं और इनका गोत्र वत्स हैं। चौहान राजपूत परंपरा में भगवान राम के वंशज माने जाते हैं। चौहान राजपूत, आबू में हुए यज्ञ में सम्मिलित होने कारण से अग्निवंशी भी कहलाते हैं। बाड़मेर के हरपालिया कीर्तिस्तम्भ शिलालेख के अनुसार, अचलेश्वर शिलालेख के अनुसार, अजमेर के सरस्वती मंदिर के शिलालेख के अनुसार तथा हम्मीर महाकाव्य के अनुसार चौहान राजवंश भगवान राम के वंशज हैं। चौहान राजपूतों का निकास स्थान अहिछत्रपुर (नागौर) माना जाता है, यही से निकलकर चौहानों ने अनन्त प्रदेश (शेखावाटी), अजमेर और सांभर पर अधिकार करके सांभर में अपनी कुलदेवी माता शाकम्भरी की मूर्ति स्थापित की और सांभर को अपने राज्य की राजधानी बनाई। सांभर नाम, देवी शाकम्भरी के नाम पर रखा गया है। चौहान वंश का मूलपुरुष चाहमान है, चाहमान नाम से ही इनके वंशज चौहान कहलाए। चौहानों के बहिभाट के अनुसार चाहमान के पूर्वज मौर्य क्षत्रिय थे और मौर्यो की एक शाखा ही चौहान हैं। मौर्य भी श्रीराम के वंशज थे और सूर्यवंशी थे। तो इस प्रकार चौहान राजपूत भी श्रीराम के वंशज ही है। चौहान की राजधानी जब सांभर थी, तब वह शत्रुओं से और सैन्य दृष्टि से सुरक्षित नहीं थी, इसलिए चौहानों ने अपनी राजधानी सांभर से अजमेर स्थानांतरित कर ली। लेकिन राज्य का नाम सांभर ही रहा। चौहानों का साम्राज्य अजमेर से दिल्ली, सिन्ध में थट्टा से पंजाब में मुल्तान, लाहौर, पेशावर एवं उत्तर पश्चिम में काबुल तक था, दक्षिण में चौहान साम्राज्य की सीमा नर्मदा नदी तक थी। इस विस्तृत क्षेत्र में चौहानों के अनेक राज्य थे। सर्वप्रथम भारत में चौहानों ने सांभर-अजमेर राज्य की स्थापना की थी, इस राज्य के आदिपुरुष वासुदेव चौहान माने जाते हैं, वासुदेव चौहान ने हुणों से युद्ध किया था और उन्हें पराजित भी किया था। सन् 685ई. के आसपास इस्लाम धर्म के प्रचारक रोशन अली सिन्ध आए। सिन्ध में चौहानों के एक स्थानीय राज्याधिकारी ने रोशन अली का अपमान कर दिया था, इसलिए खलीफा ओमार ने अब्दुल्लास के नेतृत्व में एक सैनिक दल चौहानों को दण्डित करने के लिए भेजा। सिन्ध में चौहानों के विरुद्ध हुए युद्ध में अब्दुल्लास मारे गए और चौहानों ने उनकी सेना को खदेड़ दिया, परन्तु अरबों की हारी हुई सेना थार रेगिस्तान पार करके अजमेर पहुंच गई। अजमेर में हुए युद्ध में चौहान पराजित हुए और यहां के चौहान शासक ढोलाराय को मारकर, सिन्ध में मारे गए अब्दुल्लास की कुर्बानी का बदला लिया गया। ढोलाराय के पुत्र सामन्तराय(माणकराय) अजमेर से सांभर की ओर पीछे हट गए। उन्होंने 685ई. में सांभर को अपनी राजधानी बनाई। सामन्तराय (माणकराय) चौहान ने भी चौहान राज्य का काफी विस्तार किया था।
सामन्तराय के बाद नरदेव, जयराज और विग्रहराज प्रथम शासक हुए। विग्रहराज प्रथम भी काफी महान शासक हुए, उन्होंने चौहान वंश के गौरव को खूब बढाया था और चौहान राज्य को कन्नौज के सम्राटों की प्रभुता से स्वतंत्र घोषित कर दिया था। विग्रहराज प्रथम के बाद चन्दनराज चौहान अजमेर के शासक हुए, जिनका समय 760ई. से 771ई. तक था। चन्दनराज के वंशज लाहौर पर भी शासन कर रहे थे। थोड़े दिनों पहले धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बने अफ़गान यदुवंशी, जिनमें घोर प्रमुख थे, वह काबुल से लाहौर के चौहानों पर धावे करने लगे। किरमान और पेशावर में घोरियों और चौहानों के बीच अनेक घमासान युद्ध हुए, परन्तु चौहानों ने उनका सफल प्रतिरोध करके उन्हें भारत में घुसने नहीं दिया। इसके साथ ही चन्दनराज चौहान ने अरबों के आक्रमणों से भारत की संस्कृति व सुरक्षा के लिए प्रतिहार राजपूतों के साथ सन्धि की थी। 771ई. से 784ई. तक अजमेर पर गोपेन्द्रराज (प्रथम) का शासन था। गोपेन्द्रराज प्रथम पर अरब सेनापति वारिस बेग ने सिन्ध से अजमेर पर आक्रमण किया, परन्तु अरबों को पराजित करके चौहानों ने बंदी बना लिया और भारत की आन-बान-शान की रक्षा की। 784ई. से 809ई. तक चौहान शासक दुर्लभराज चौहान थे। इन्होंने भीनमाल और उज्जैन के प्रतिहारों का आधिपत्य स्वीकार किया, और वत्सराज प्रतिहार के सहयोगी रहते हुए इन्होंने दोआबा, मध्यदेश और और बंगाल तक विजय प्राप्त कर चौहान वंश का गौरव सर्वत्र बढ़ाया। दुर्लभराज चौहान नागभट्ट द्वितीय की सेना में सेनापति भी थे।
809ई. से 836ई. तक चौहान शासक गुहक चौहान प्रथम थे। यह कन्नौज और मालवा के सम्राट नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय के प्रभुत्व में रहे। 836ई. से 863ई. तक सांभर (अजमेर) के शासक चन्दनराज चौहान द्वितीय थे। इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती। चन्दनराज चौहान द्वितीय के बाद गुहक द्वितीय गद्दी पर आए इनका समय 863ई. से 890ई. तक था। गुहक ने अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए कन्नौज के शासक भोजराज से अपनी बहन कलावती का विवाह किया था। गुहक द्वितीय भी बड़े पराक्रमी राजा थे। इनके समय भी चौहान राज्य काफी विस्तृत था। 890ई. से 917ई. तक चन्दनराज चौहान तृतीय सांभर (अजमेर) की गद्दी पर आए। यह भी बड़े शूरवीर राजा थे, इन्होंने दिल्ली के तोमर राजा रूद्र को युद्ध में पराजित किया था। 917ई. से 944ई. तक चौहान शासक वाक्पतिराज प्रथम थे, यह अपने समय के प्रतिभाशाली शासकों में से एक थे। इन्होंने प्रतिहार राजपूत राज्यों के कई भागों को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया था और जब प्रतिहार शासकों के सेनानायक तत्रराज तंवर ने खोये हुए राज्य के भागों को इनसे छिनने का प्रयत्न किया तब वाक्पतिराज ने तुरन्त ही प्रतिहार सेनानायक तत्रराज तंवर को हराकर अपने शौर्य और बल का परिचय दिया। इन्होंने कटक का किला जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया था और पृथ्वीराज विजय पुस्तक में लिखा है कि इन्होंने 188 युद्धों में विजय प्राप्त की।
944ई. से 971ई. तक चौहान शासक सिंहराज थे। इन्होंने सिन्ध-मुलता़न के अरब सेनापति हातिम को परास्त किया और हाजी-उद-दीन नामक मुस्लिम सरदार को पराजित किया। यह भी बड़े शूरवीर राजपूत राजा हुए। इन्होंने सालवान तोमर को परास्त करके अपने अधीन रखा। इनके पास घोड़ों की बड़ी विशाल फौज थी, इन्होंने चारों दिशाओं के राजाओं पर विजयश्री प्राप्त की। इन्होंने अपने आपको स्वतंत्र शासक घोषित करके "परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर" की पदवी धारण की। जब इनके चारों और शत्रु ही शत्रु हो गए तब उन शत्रुओं ने एक योजना बनाकर हत्या कर दी, जिसका बदला विग्रहराज द्वितीय ने लिया था।
971ई. से 988ई. तक सांभर-अजमेर चौहान राज्य के शासक विग्रहराज द्वितीय बने। इन्होंने राजा बनते ही अपनी पिता की हत्या का बदला लिया। विग्रहराज द्वितीय ने अपने आपको सम्राट विजयपाल प्रतिहार की प्रभुता से स्वतंत्र घोषित करके सन् 973 में सम्राट की पदवी धारण की। इनके समय चौहान साम्राज्य में अनगिनत गांव थे, जिनके कारण इनके राज्य को 'सप्तलखा' (सिवालिक) भी कहते थे। अन्य क्षेत्रों के अलावा इनके राज्य में जांगलू, शेखावाटी, रणथंभौर, कोटा, अजमेर, मांडलगढ़, सांभर, इत्यादि अनेक क्षेत्र थे। विग्रहराज द्वितीय ने गुजरात के राजा मुलराज चालुक्य को मारकर नर्मदा नदी तक विजयश्री प्राप्त की। विग्रहराज द्वितीय एक महान विजेता एवं शूरवीर घुड़सवार योद्धा थे, जिसके कारण इनके शत्रु इनसे भयभीत रहा करते थे, इन्होंने कई राजाओं को हराकर अपने अधीन करके रखा था। 988ई. से 1012ई. तक दुर्लभराज चौहान द्वितीय अजमेर-सांभर के शासक थे, यह अपने समय के प्रतापी शासक थे। इन्होंने नाडौल के चौहान शासक महेन्द्र को पराजित किया था। हम्मीर रासो के अनुसार सम्राट दुर्लभराज चौहान द्वितीय का भटनेर अग्रणी किला था, यहां इन्होंने महमूद गजनी के पिता सुबुक्तगीन को पराजित किया था और साथ में उनसे श्रेष्ठ नस्ल के 1200 घोड़े भी छिन लिए थे, इसलिए "सुल्तानग्रह" उनकी पदवी बन गई।
1012ई. से 1026ई. तक गोविन्दराज चौहान तृतीय अजमेर-सांभर के शासक थे, इन्होंने चेडी के राजा भोज को पराजित करके अपने अधीन किया। महमूद गजनी ने अपनी पिता की मौत का बदला लेने के लिए और चौहानों को दण्डित करने के लिए 1025ई. में अजमेर पर आक्रमण किया और तारागढ़ किले को आ घेरा। लेकिन गोविन्दराज चौहान ने महमूद गजनी को पराजित कर विजयश्री प्राप्त की।
1026ई. से 1040ई. तक वाक्पतिराज द्वितीय चौहान अजमेर-सांभर के शासक थे, इन्होंने मेवाड़ के राजा अम्बाप्रसाद को युद्ध में पराजित किया और कहते हैं कि इन्होंने युद्ध में राजा अम्बाप्रसाद को कटार से मारा था, यह भी वीर क्षत्रिय पुरुषों में गिने जाते हैं।
1040ई. में वाक्पतिराज द्वितीय के बाद वीर्यराज शासक बने पर इन्होंने मालवा के राजा भोज के साथ युद्ध किया और उसमें उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
1040ई. में ही अपने भाई वीर्यराज की जगह चामुण्डाराज शासक बने, जिन्होंने 1065ई. तक शासन किया। इन्होंने पंजाब में हजमुद्दीन नामक मुस्लिम सरदार को हराया। 1065ई. में सिंहट चौहान राज्य के राजा बने, लेकिन 1065 में ही इनकी मृत्यु हो गई।
1065ई. से 1070ई. तक दुर्लभराज चौहान तृतीय सांभर अजमेर के शासक थे। इन्होंने गुजरात के राजा कर्ण को हराने में मालवा के राजा उदादित्य की सहायता की थी। इन्होंने गजनी के सुल्तान इब्राहिमशाह के साथ युद्ध किया, जिसमें उन्होंने वीरगति प्राप्त की। 1070ई. से 1090ई. तक सांभर-अजमेर के राजा विग्रहराज चौहान तृतीय बने। इन पर गजनी के सेनापति शाहबुद्दीन ने आक्रमण किया था, तब इन्होंने मंडोर के प्रतिहारों, मेवाड़ के गहलोतों और तोमरवाटी के तोमर, घोर, मेवाती, द्रोणपुर के मोहिलों, सिन्ध के बलौचों, थट्टा, मुलतान एवं भटनेर के भाटियों और अन्य सामन्तों और जागीरदारों का आह्वान किया कि वह गजनी के सेनापति शाहबुद्दीन के विरुद्ध लड़ने के लिए तत्काल अपनी सेनाओं के साथ उपस्थित होवें। भटनेर के भाटी राजा ने उन्हें नजर भेजी और सेना सहित उपस्थित हुवे तथा साथ ही अन्य सभी सामंत अपनी सेना लेकर उपस्थित हुए और इन सभी ने मिलकर गजनी के सेनापति शाहबुद्दीन को बहुत बुरी तरह से परास्त किया। दुर्लभराज चौहान तृतीय ने परमार राजा उदयादित्य को सांरग नामक अश्व भेंट किया और एक छोटी सी घुड़सवार सेना सहायता के लिए भेजी, जिससे उदादित्य परमार ने गुजरात के राजा कर्णदेव चालुक्य को परास्त किया। दुर्लभराज तृतीय की अकाल मृत्यु हो गई थी, इनकी मृत्यु होते ही अजमेर राज्य बरबाद हो गया था और इनके पुत्र सारंगदेव की भी मृत्यु हो गई थी।
विग्रहराज तृतीय के बाद पृथ्वीराज चौहान प्रथम ने सांभर में अपना राज्य जमाया, इन्होंने 1090ई. से 1110ई. तक शासन किया। इन्होंने गजनी के सुल्तान अलाउद्दीन मसूद द्वारा बुगलीशाह के नेतृत्व में भेजी गई सेना को पराजित किया। यह बड़े दातार राजा थे। एक बार इनके समय में पुष्कर में 700 सोलंकी राजपूत ब्राह्मणों को लुटने के उद्देश्य से आए थे, कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान प्रथम ने अकेले ही 700 सोलंकियों को मार गिराया। 1110ई. से 1135ई. तक अजयराज चौहान द्वितीय सांभर के शासक हुए, इन्होंने बर्बाद हुए अजमेर राज्य को पुनः स्थापित किया और वहां पर किला बनवाया, सांभर राज्य सैन्य दृष्टि से सुरक्षित नहीं था, इस वजह से ही अजमेर राज्य उन्होंने बसाया था। इन्होंने गजनी के सुल्तान बहरामशाह को युद्ध में पराजित किया था। अजयराज चौहान द्वितीय के समय चौहानों की शक्ति सुदृढ़ हो गई थी और साथ ही इनके समय में चौहान राज्य का खूब विस्तार हुआ। अजयराज चौहान का काल वास्तव में चौहानों के साम्राज्य निर्माण का काल माना जाता है। अजयराज चौहान ने उज्जैन पर आक्रमण करके मालवा के परमार राजा नरवर्मन को परास्त किया और उनके सेनापति सुलहाणा को परास्त किया। इन्होंने आक्रमणकारी सालार हुसैन को भारत से बाहर पूर्व दिशा की ओर खदेड़ा था। इन्होंने चाचिग, सिंधुल व यशोराज नामक राजाओं को हराकर उनका वध किया था। इन्होंने कई मुसलमान सरदारों को पराजित किया था। यह अपने जीवन के अंतिम वर्षों में राजपाट छोड़कर अरावली की पहाड़ियों में चले गए तभी वहां पर एक मुस्लिम सेना की टुकड़ी गायों का हरण कर लें जानें लगी तब वहां यह मुस्लिम आक्रमणकारियों से भीड़ गए और इनका युद्ध करते हुए सर कट गया परंतु सिर कटने के बाद भी मुस्लिम आक्रांताओं से युद्ध करते हुए इन्होंने आक्रांताओं को अजमेर से गुजरात के अंजार जिले तक खदेड़ दिया और अजमेर से गुजरात के अंजार जिले तक की दूरी 600 किलोमीटर है। इनकी अजमेर और गुजरात के अंजार दोनों जगह मंदिर है और पूजा होती है।
1135ई. से 1150ई. तक अर्णौराज चौहान अजमेर-सांभर के शासक बने। अर्णौराज चौहान गुजरात के अणहिलवाड़ पाटण के सिद्धराज जयसिंह सोलंकी के समकालीन शासक थे, इनका सिद्धराज जयसिंह सोलंकी के साथ हुए युद्ध में अर्णौराज चौहान विजयी रहे। सिद्धराज जयसिंह सोलंकी की बहन कंचनदेवी का विवाह अर्णौराज चौहान के साथ हुआ था। अर्णौराज चौहान एक सफल शासक थे। अर्णौराज चौहान ने गजनी के शासक सुल्तान बहरामशाह के विद्रोही मोहम्मद भालिम को शरण देकर नागौर का परगना दिया था, जिससे बहरामशाह ने क्रोधित होकर अर्णौराज चौहान पर आक्रमण कर दिया। बहरामशाह की सेना अजमेर के आनासागर मैदान में आ पहुंची, यहां अर्णौराज चौहान ने बहरामशाह को पराजित कर दिया, कहते हैं कि अर्णौराज चौहान ने इतना भयंकर युद्ध किया था कि गजनी से अजमेर तक का मार्ग शत्रुओं की लाशों से पट गया। बहरामशाह युद्ध हारकर गजनी लौट गया। अर्णौराज चौहान ने युद्ध समाप्त होने के पश्चात चन्द्रभागा नदी पर बांध बनवाया और आनासागर झील बनवाई ताकि युद्ध के मैदान की भूमि से अपवित्र मुसलमानों का रक्त धोया जा सके। इन्होंने मालवा के नरवर्मन परमार को भी पराजित किया था। इन्होंने अपनी सेना पल्लू से सरस्वती नदी की घाटी से होकर सिन्ध पर आक्रमण के लिए भेजी, वहां उनकी सेना ने एक बहुत बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया था, वापस आते समय उनकी सेना ने पंजाब पर आक्रमण किया, पंजाब में भी उनकी सेना ने एक बड़े क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। गुजरात के कुमारपाल चालुक्य (सोलंकी) के साथ हुए युद्ध में अर्णौराज चौहान पराजित हो गए थे। इस सफल एवं स्वाभिमानी, ख्यातिवान और वीर पुरुष की हत्या उन्ही के पुत्र जगदेव ने कर दी थी और जगदेव चौहान अजमेर-सांभर के राजा बने। जगदेव चौहान ने कुछ महिने ही शासन किया था, जगदेव चौहान को उनके भाई विग्रहराज चौहान चतुर्थ ने गद्दी से उतार फेंका था और स्वयं राजा बन गए। विग्रहराज चतुर्थ विसलदेव के नाम से भी विख्यात है। इनका नाम राजपुताना में ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में प्रख्यात है, यह बड़े वीर पुरुष हुए थे।
इन्होंने 1150ई. से 1164ई. तक शासन किया था। इन्होंने गजनी के यमिनी शासक खुशरोशाह को खेतड़ी के पास पराजित किया था। दिल्ली पर दो सौ वर्षों से तोमर राजपूत शासन कर रहे थे और दिल्ली को लेकर ही दो सौ सालों से चौहानों और तोमरों में संघर्ष चल रहा था, विग्रहराज चौहान उर्फ विसलदेव ने 1150ई. में अनंगपाल तोमर को परास्त करके दिल्ली पर अधिकार कर तोमरों को अपने अधीन कर लिया था और तोमर शासन को समाप्त कर दिया था। सन् 1164ई. में इन्होंने तुर्कों को पंजाब में परास्त करके पंजाब से बाहर निकाला। मालवा के परमार शासक और मेवाड़ के अरिसिंह विग्रहराज चतुर्थ के प्रमुख सामंतों में से थे, यह दोनों अजमेर के दरबार में उपस्थित रहते थे। इन्होंने पंजाब में हिसार आदि क्षेत्रो को मुसलमानों से जीता था। विग्रहराज चौहान चतुर्थ की राज्य की सीमाएं शिवालिक पहाड़ियों से होते हुए सहारनपुर तथा उत्तरप्रदेश से भी आगे तक थी। इन्होंने कुमारपाल चालुक्य से जालौर, पाली और नागौर के परगने जीत लिए थे। विग्रहराज चौहान चतुर्थ उर्फ विसलदेव ने विदेशी तुर्क म्लेच्छों से भारत की सुरक्षा की और उनको भारत से बाहर खदेड़ा था और इसमें कोई भी संदेह नहीं है कि अपनी शक्ति, बल और पराक्रम से विग्रहराज ने म्लेच्छो का दमन कर आर्यावर्त को वास्तव में आर्य भूमि बना दिया था। विग्रहराज चतुर्थ एक अच्छे सेनापति व राजा होने के साथ-साथ वह साहित्य व कला के भी प्रेमी थे। वह स्वयं एक अच्छे कवि भी थे, उन्होंने स्वयं हरकेलि नाटक लिखा था। अजमेर में उन्होंने संस्कृत विद्यालय का निर्माण भी करवाया था। इनका काल सपालदक्ष, अजमेर-सांभर राज्य का स्वर्ण युग था। प्राचीध कवियों के साथ-साथ आधुनिक इतिहासकारों ने भी विग्रहराज चतुर्थ की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है।
विग्रहराज चतुर्थ के बाद अपर गांगेय राजा बने। अपर गांगेय ने केवल कुछ महिने ही शासन किया था। इनके बाद सन् 1165ई. से 1169ई. तक पृथ्वीराज द्वितीय चौहान राज्य के शासक बने। इन्होंने महमूद गजनी के अंतिम वंशज लाहौर के सुल्तान खुशरौ मलिक को युद्ध में पराजित किया था। पृथ्वीराज द्वितीय के समय चौहान साम्राज्य जहाजपुर, चित्तौड़ के मेनाल तक और पंजाब तक विस्तृत था। इन्होंने ब्राह्मणों को मुक्त हदय से सोना दान में दिया था। पृथ्वीराज द्वितीय के बाद सोमेश्वर चौहान गद्दी पर आए, इन्होंने कुमारपाल चालुक्य के पुत्र अजयपाल चालुक्य को सन् 1177ई. में पराजित किया था। इन्होंने कुमारपाल चालुक्य के कोंकण के शत्रु मल्लिकार्जुन को परास्त किया था जिनसे इनकी खूब ख्याति हुई थी। इन्होंने गुजरात के राजा भीमदेव सोलंकी से युद्ध किया था, जिसमें इन्होंने वीरगति प्राप्त की।
सोमेश्वर चौहान के देहांत के बाद 1178ई. में पृथ्वीराज चौहान तृतीय मात्र 11 वर्ष की छोटी उम्र में अजमेर की गद्दी पर आए। इन्होंने अजमेर के साथ-साथ दिल्ली पर शासन किया था, इन्होंने दिल्ली पर राज करके सम्पूर्ण भारत पर एकछत्र चौहानों का राज स्थापित किया था। यह अंतिम हिंदू भारत सम्राट थे। पृथ्वीराज चौहान की वीरता भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में विख्यात है। इन्होंने 11 वर्ष की छोटी उम्र में अपने राज्य को संभाला ही नहीं बल्कि अपने विद्रोहियों और शत्रुओं से अपने राज्य की रक्षा भी की। पृथ्वीराज चौहान ने छोटी उम्र में गद्दी पर आते ही चौहान राज्य का खूब विस्तार किया था, इनका समय चौहानों का स्वर्णिम काल था। इन्होंने सर्वप्रथम गद्दी पर आते ही अपने चचेरे भाई नागार्जुन का अंत किया था, क्योंकि नागार्जुन विद्रोही हो गया था और नागार्जुन अपने आपको चौहान राज्य का असली शासक मानता था। इसलिए पृथ्वीराज चौहान ने नागार्जुन पर चढ़ाई करके उसके विद्रोह का अंत किया। पृथ्वीराज चौहान ने अपने राज्य में उत्पात मचाने वाले भण्डानको का दमन किया, और शांति स्थापित की। पृथ्वीराज चौहान एक महान विजेता और पराक्रमी योद्धा थे। इन्होंने महोबा पर भी विजय प्राप्त की थी, जिसमे पृथ्वीराज चौहान की सेना के हाथों आल्हा और ऊदल ने वीरगति प्राप्त की थी। पृथ्वीराज चौहान ने अपने पिता की मृत्यु का बदला भीमदेव सोलंकी को मार कर लिया था, क्योंकि पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर चौहान भीमदेव सोलंकी के हाथों मारे गए थे। पृथ्वीराज चौहान ने गहडवालों पर भी विजयश्री प्राप्त की थी। पृथ्वीराज चौहान ही नहीं बल्कि उनके सामंत भी बड़े शूरवीर थे। पृथ्वीराज चौहान के सामंतों ने कई बार तुर्क म्लेच्छों को पराजित किया था और शाहबुद्दीन गौरी को भी बंधक बनाया था। पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को 17 बार युद्ध में पराजित किया था। परंतु मोहम्मद गौरी बार-बार पृथ्वीराज चौहान से क्षमा याचना करता था जिससे पृथ्वीराज चौहान उन्हें क्षत्रिय आचरण के अनुसार क्षमा कर देते थे। परंतु फिर भी वो बार-बार पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया करता था।
मोहम्मद गौरी एक विश्वासघाती और छल-कपटी व्यक्तित्व का था। उसको पृथ्वीराज चौहान पर विजयश्री प्राप्त करनी थी चाहे बल से या छल से। मोहम्मद गौरी को तराइन के प्रथम युद्ध के हार का बदला पृथ्वीराज चौहान से लेना था। इसलिए उसने अपनी सेना संगठित की और गजनी से लाहौर पहुंचा, लाहौर पहुंचकर उसने अपना एक दूत पृथ्वीराज चौहान के पास भेजा और कहलवाया कि वह मोहम्मद गौरी की अधीनता स्वीकार कर और इस्लाम स्वीकार कर लें। पृथ्वीराज चौहान ने उत्तर में भिजवाया कि उसे अपने देश लौट जाना चाहिए वरना हर बार की तरह उसे इस बार भी युद्ध स्थल में हारना पड़ेगा। मोहम्मद गौरी इस बार छल-कपट का सहारा लेते हुए पृथ्वीराज चौहान पर विजय प्राप्त करना चाहता था, इसलिए उसने अपना दूत वापस पृथ्वीराज चौहान के पास भेजा और कहलवाया कि वह युद्ध की जगह सन्धि करना चाहता है। इस सन्धि वार्ता ने पृथ्वीराज चौहान को भ्रम में डालने का काम कर दिया। पृथ्वीराज चौहान को लगा कि यह एक सन्धि वार्ता है इसलिए वह केवल एक छोटी-सी सेना लेकर तराइन के मैदान की ओर रवाना हुए। पृथ्वीराज चौहान और उनकी सेना तराइन के मैदान में पहुंची। वहां पहुंचकर उन्होंने रात-भर खूब आनन्द मनाया क्योंकि वह सब संधि वार्ता के भ्रम में थे। इसके विपरीत मोहम्मद गौरी ने शत्रुओं को भ्रम में डाले रखने के लिए अपने युद्ध-शिविर में आग जलाए रखी। फिर जैसे ही सुबह हुई तो मोहम्मद गौरी ने अपनी घुड़सवार सेना को चार भागों में बांट दिया। राजपूत सैनिक शौच आदि के कार्य करने के लिए इधर उधर बिखर गए, इस मौके का फायदा उठाकर मोहम्मद गौरी ने अपनी सेना को पृथ्वीराज चौहान की सेना पर चारों तरफ से आक्रमण करने का आदेश दे दिया, अचानक हुए इस आक्रमण से चारों ओर भगदड़ मच गई। पृथ्वीराज चौहान ने अपने हाथी पर बैठकर तुर्कों से काफी लोहा लिया परंतु तुर्को के छल-कपट और धोखेबाजी के कारण राजपूत सेना धराशायी हो गई और पृथ्वीराज चौहान को पकड़कर बंदी बना लिया गया।
पृथ्वीराज चौहान की सेना में कई वीर राजपूत सामन्त थे वो भी लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद तुर्को की सेना का हांसी, सिरसा, अजमेर और दिल्ली आदि जगहों पर उनका आधिपत्य स्थापित हो गया और फिर बाद में पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर गजनी ले जाया गया जहां उनकी दोनों आंखें फोड़ दी गई परंतु फिर भी नेत्रहीन पृथ्वीराज चौहान ने अपना शब्दभेदी बाण चलाकर अपना शौर्य और साहस दिखलाकर, अपने शब्दभेदी बाण से मुहम्मद गौरी का वध किया। पृथ्वीराज चौहान एक महान विजेता, एक वीर योद्धा, और एक शूरवीर सेनानायक थे, अगर मोहम्मद गौरी उनसे छल-कपट ना करता तो शायद आज भारत का इतिहास कुछ ओर ही होता। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के साथ ही चौहानों का यशस्वी शासन समाप्त हो गया परन्तु फिर भी चौहान राज्य छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया। जैसे - पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्दराज चौहान ने रणथंभौर रियासत पर अधिकार किया और वहां राज किया। इसके अलावा नाडौल भी चौहानों की शक्ति का प्रमुख केन्द्र था। इसके अलावा जालौर भी चौहानों का प्रमुख राज्य था। कोटा और बूंदी भी चौहानों की हाडा खांप की प्रमुख रियासतें थीं। चौहानों की देवड़ा खांप की सिरोही रियासत भी प्रमुख रियासतों में से एक रही है। गुजरात और मध्यप्रदेश में भी चौहानों की शक्ति के कई केन्द्र रहे हैं। इसके अलावा भी चौहानों की कई छोटी-बड़ी रियासते, ठिकाने, जागीरें तथा गांव इत्यादि हैं।
1). गजनी से जैसलमेर, हरिसिंह जी भाटी - अध्याय आठ - ऐतिहासिक प्रर्यावरण, एक विहंगम दृष्टि
2). राजस्थान का इतिहास
3). चौहान कल्पद्रुम भाग-1
4). Rajasthan Through the Ages
5). Annals and antiquities of Rajasthan, Volume 2nd
6). History of Jaisalmer, R.V. somani
7). क्षत्रिय राजवंश लेखक रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी
8). मुहणोत नैणसी री ख्यात
9). कान्हड़ दे प्रबंध
10). Early Chauhan Dynasties page no. 4 to 10
11). पृथ्वीराज विजय
12). Archeological Survey of India, Volume 2nd Page no. 263
13. Indian Antiquery page no 31
14. गौरीशंकर हिराचंद ओझा, उदयपुर का इतिहास, भाग 1 पृष्ठ संख्या 60-61
Chauhan
Chauhan Kshatriya History
Chauhan Rajput History in Hindi
Chohan
Chouhan
History of Ajmer and Sambhar
History of Chauhan Rajput
History of Chauhans
Rajput history
चौहान क्षत्रिय राजपूतों का इतिहास
चौहान राजपूतों का इतिहास
चौहान वंश का इतिहास
चौहान वंश का इतिहास शाखायें ठिकाने


Post a Comment
0 Comments