जब राणा प्रताप ने लगाई अपने पुत्र अमरसिंह को फटकार

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जब राणा प्रताप ने लगाई अपने पुत्र अमरसिंह को फटकार


भारतवर्ष में कभी भी वीरों की कमी नहीं रही हैं। भारतवर्ष में विशेषरूप से राजस्थान का मेवाड़ सदैव वीरों को जन्म देने वाली भूमि रही हैं। एक समय मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप सिंह थे। उसी समय दिल्ली पर सम्राट अकबर राज्य करता था। सब हिन्दू शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी। लेकिन महाराणा प्रताप सिंह अधीनता मानने को तैयार नहीं थे। अकबर ने राणा प्रताप को खूब लालच और प्रलोभन देकर अपने अधीन करना चाहा, मगर राणा प्रताप को अपने देश की स्वतंत्रता और आन-बान प्यारी थी। वे कभी भी प्रलोभन और लालच के आगे झुके नहीं। 

इसलिए अकबर ने सन् 1580 में राणा प्रताप को अपने अधीन करने के लिए अब्दुल रहीम खानखाना को भेजा। अब्दुल रहीम खानखाना अकबर का एक विश्वासपात्र सेनापति था। अब्दुल रहीम खानखाना ने मेवाड़ में अपनी छोटी सी सैनिक टुकड़ी लाकर अपना डेरा जमा रखा था। तब राणा प्रताप के बड़े पुत्र अमरसिंह को पता लगा कि खानखाना ने मेवाड़ में अपना डेरा जमा रखा है तब एक रात को अमरसिंह ने अब्दुल रहीम खानखाना की सेना पर आक्रमण कर दिया और खानखाना के जनाने डेरे पर अधिकार कर लिया और खानखाना की बेगमों और दासियों को अपने साथ अपने डेरे पर ले गए। 

अमरसिंह ने अन्य राजपूत सरदारों सहित प्रसन्न होकर राणा प्रताप के सम्मुख खानखाना की बेगमों को प्रस्तुत किया। राणा प्रताप उसी समय गुस्से में भर गए। राणा की आंखें लाल हो गई। अमरसिंह व अन्य राजपूत सरदार शांत खड़े होकर राणा प्रताप के गुस्से को देख रहे थे। उनमें से किसी की भी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। सब के सब राणा प्रताप के डर से कांप रहे थे। बहुत समय मौन रहने के बाद राणा प्रताप बोले - 'अमर सिंह, तुम क्षत्रिय हो, मैंने तुम्हारे बारे में कभी यह नहीं सोचा कि तुम इतना नीच कार्य करोगे।' 

अमरसिंह सिर झुकाए खड़े थे। अन्य राजपूत सरदार भी अब थर-थर कांप रहे थे। राणा प्रताप कुछ देर मौन रहने के बाद फिर बोले - "अमरसिंह, तुम यह मत भूलो कि तुम्हारी और मेवाड़ की लड़ाई सम्राट अकबर की नीतियों से हैं, ना कि इन भोली भाली शहजादियों और बेगमों से। मेवाड़ के राजकुमार को यह शोभा नहीं देता हैं। यह सब बेगमें तुम्हारी मां और बहनों के समान है, जाओ और इनसे क्षमा मांगकर, इन्हें ससम्मान खानखना के डेरे में अभी छोड़ आओ।"

महाराणा प्रताप वहां से उठकर अपने दूसरे कमरे में चले गए। अमरसिंह व उनके सरदारों ने बेगमों व शहजादियों के डोलो को खानखाना के डेरे में तुरन्त ही ससम्मान पहुंचा दिया। बेगमों व अन्य शहजादियों ने खानखाना के डेरे में पहुंच कर राणा प्रताप की महिमा का खूब गुणगान किया। अब्दुल रहीम खानखाना भी महाराणा प्रताप के चरित्र से काफी प्रभावित हुआ था।

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