मेवाड़ के गौरव :- राजा गुहिल (गहलोत/गुहिलोत वंश के संस्थापक)

मेवाड़ के गौरव :- राजा गुहिल (गहलोत/गुहिलोत वंश के संस्थापक)


यह तो सब ही जानते हैं कि मेवाड़ के गहलोत/सिसोदिया राजवंश के प्रथम शासक और संस्थापक राजा गुहिल थे, जो कि सूर्यवंशी थे। राजा गुहिल भगवान राम के वंशज थे। कहते हैं कि गुहिल के पिता गुजरात के सौराष्ट्र प्रांत के प्रसिद्ध वल्लभीपुर राज्य के राजा थे। एक बार किसी शत्रु राजा ने वल्लभीपुर पर आक्रमण किया, गुहिल के पिता ने जमकर सामना किया लेकिन अंत में पराजय हुई और मारे गए। जैसे ही यह समाचार महलों में पहुंचा गुहिल की माता ने भागकर दूर जंगल में शरण ली। उसके गर्भ में गुहिल था। साथ में एक सेविका कमलावती भी थी जो रानी की पूरी सेवा में थी।

सौभाग्य से रानी ने जिस गांव में आश्रय लिया, वह बहुत ही घनी पहाड़ियों में स्थित था। गांव के निवासी भी बहुत अच्छे थे। जल्द ही रानी ने गांव में ही स्थित एक अत्यधिक सुरक्षित गुफा को देखा, तो रानी को वह स्थान बहुत ही पसंद आया। रानी ने उस गुफा को ही अपना निवास स्थान बनाने की इच्छा प्रकट की। गांव वालों ने भी रानी की पसन्द की तारीफ की और अब रानी तथा उनकी सेविका कमलावती गुफा में रहने लगे। कुछ ही दिनों में उस गुफा में रानी के गर्भ से गुहिल ने जन्म लिया। सभी गांव वाले तथा रानी प्रसन्न हुए। अब बात नाम पर आकर ठहरी की क्या नाम रखा जाए? इस पर गांव वालों ने "गुहा" नाम रखा क्योंकि उसने एक गुफा में जन्म लिया था। यही "गुहा" आगे चलकर गुहिल नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

जैसे-जैसे समय गुजरता गया वैसे-वैसे गुहिल भी बड़ा होता गया। एक दिन रात में रानी को लगा कि अब वह अधिक जीवित नहीं रहेगी। रानी ने एक दिन अपनी सेविका कमलावती को गुहिल की सम्पूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी और चल बसी। गुहिल की माता का जब देहांत हुआ तब वह केवल पांच साल के थे। रानी की अचानक मृत्यु पर पूरे गांव को बहुत दुःख हुआ। गुहिल की माता के देहांत के बाद सेविका कमलावती गुहिल का पूरा ध्यान रखती थी और पढ़ाती-लिखाती भी थी। यही नहीं गांव वाले भी गुहिल का पूरा ध्यान रखते थे।

समय बीतने के साथ ही गुहिल दस-बारह साल का हो गया। गुहिल हमेशा ऐसा कुछ करता था कि कमलावती व गांव वालों को लगता था कि गुहिल बहुत बड़ा कार्य करेगा। एक दिन गुहिल ईडर के जंगलों की ओर चल पड़ा, गुहिल को ईडर का जंगल पसंद आया। गुहिल वैसे तो उम्र में छोटा था, परन्तु रंग, शक्ल-सूरत व कद-काठी में काफी आकर्षक था। परिणाम यह हुआ कि गुहिल जंगलों में भीलों का सरदार चुन लिया गया। बाकायदा एक भील बालक ने अपनी अंगुली को चीरकर रक्त से गुहिल का राजतिलक भी किया था, सचमुच में अब गुहिल राजा बन गया था और बहुत शीघ्र ही गुहिल ने एक नये राज्य का निर्माण भी कर लिया था। 

उस समय के ईडर क्षेत्र पर मंडलिक नाम के एक राजा का अधिकार था, लेकिन उसका कोई बेटा नहीं था। उसे जब गुहिल के बारे पता लगा और साक्षात् देखा तो बिना एक क्षण गंवाये राजा मंडलिक ने गुहिल को गोद ले लिया। अपना पूरा ईडर क्षेत्र गुहिल को सौंप दिया और स्वयं तीर्थयात्रा पर चले गए। 

बस, अब क्या था? देखते ही देखते, राज्य की सीमाएं दिन-दुगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ती चली गई। अब वह मेवाड़ की सीमा में भी बढ़ने को तैयार था। उसके पास केवल भील युवा ही नहीं थे, बल्कि अन्य जातियों के व्यक्ति भी गुहिल की सेना में शामिल थे। गुजरात एवं मेवाड़ से लगे अंचलों में राजा गुहिल की ख्याति दूर-दूर तक फैलती चली गई और हिन्दुस्तान के सर्वाधिक प्रतिष्ठित मेवाड़ के राजवंश का वह संस्थापक बन गया था। राजा गुहिल के नाम से ही उनके वंशज गहलोत या गुहिलोत कहलाते हैं। हम सभी सम्मान के साथ आज भी राजा गुहिल का स्मरण करते हैं।

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