महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह जी के बचपन का एक अनसुना किस्सा - The Untold incident of Maharana Pratap brother Maharaj Shakti Singh


Maharaj Shakti Singh, Mewar History, Maharana Pratap brother Shakti Singh, मेवाड़ इतिहास, उदयपुर इतिहास, महाराज शक्ति सिंह

महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह जी के बचपन का एक अनसुना किस्सा - The Untold incident of Maharana Pratap brother Maharaj Shakti Singh

मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह का दरबार लगा हुआ था। सभी सामंत व राजपरिवार के सदस्य अपने-अपने निश्चित स्थान पर बैठे हुए थे। दस वर्षीय राजकुमार शक्तिसिंह भी अपने स्थान पर बैठे हुए थे और दरबार की कार्यवाही देख रहे थे। दरबार में राज्य की समस्यायों पर विचार-विमर्श हो रहा था, इसी बीच हथियार बनाने वाले एक लोहार अपनी तलवार महाराणा को भेंट करने आया। महाराणा ने तलवार को बहुत ही ध्यानपूर्वक देखी। तलवार की चमक-दमक से ऐसा लग रहा था कि तलवार बहुत ही तीखी धार वाली हैं। सब दरबारियों का ध्यान उस तलवार पर था। महाराणा ने तलवार को अपने समीप बैठे एक राजपूत सरदार की ओर बढ़ाते हुए बोले- "तलवार देखने में तो अच्छी हैं, जरा इसकी धार की और जांच-परख करो।"


राजपूत सरदार को कुछ क्षण तक समझ में नहीं आया कि वह तलवार की परख कैसे करें? साधारणतया एक राजपूत की तलवार, दुश्मन के सिर पर चलाकर या फिर उससे किसी जानवर की बलि देकर परीक्षा की जाती है। सामन्त के शरीर पर पसीना छूट गया कि यहां तलवार की परख कैसे करें? न तो दरबार में किसी मनुष्य पर तलवार का वार करके परखी जा सकती थी और ना ही यहां किसी जानवर पर तलवार की परीक्षा की जा सकती थी। आखिर उस राजपूत सरदार को एक उपाय सूझा और उसने द्वार पर खड़े दरबान को बुलाया तथा उसे एक मोटा रस्सा लाने को कहा। 


दरबान रस्सा लाने के लिए बाहर चला गया, किन्तु दस वर्षीय राजकुमार शक्तिसिंह को यह बात ठीक नहीं लगी कि तलवार की परख रस्से से की जाए। शक्तिसिंह ने एक बार तो सब दरबारियों और महाराणा पर दृष्टि डालकर प्रतिक्रिया जाननी चाही, किन्तु किसी के चेहरे पर कोई नवीन भाव प्रकट नहीं हो रहा था। तब शक्तिसिंह जी अपने स्थान पर से उठे ओर उस सामन्त की ओर बढ़े, जो तलवार हाथ में लिए रस्से की प्रतिक्षा कर रहा था। सब दरबारी व महाराणा उत्साहपूर्वक शक्तिसिंह की ओर देखने लगे। उस दस वर्षीय नन्हे राजकुमार शक्तिसिंह ने सामन्त से कहा कि - "मुझे तलवार दो, मैं इसकी परख करता हूं"।


महाराणा व दरबारियों के चेहरे पर हंसी बिखर गई, किन्तु शक्तिसिंह जी ज्यों के त्यों तलवार प्राप्त करने की चाह में खड़े रहे। जब दरबार में हंसी के ठहाके रूके तो महाराणा ने शक्तिसिंह से पूछा कि आप तलवार लेकर क्या करोगे, यह बहुत तेज धार वाली हैं। महाराणा के बोलते ही शक्तिसिंह जी उनके पास गये और बोले कि "दाता, मुझे तलवार दिला दो, मैं तो देखूं वह कैसी है?"


महाराणा उदयसिंह, शक्तिसिंह के मन में छिपे भावों को समझ नहीं पाए और सामन्त को तलवार देने का संकेत दे दिया। महाराणा ने शक्तिसिंह से कहा कि - "जाओ और देख लो, पर ध्यान रखना, वह तुम से बड़ी हैं।" 


शक्तिसिंह जी दौड़े-दौड़े उस सामन्त की ओर गए जिसके पास तलवार थी, सामन्त ने उनके हाथों में तलवार थमा दी। बस, अब क्या था शक्तिसिंह जी ने चट से अपनी अंगुली पर तलवार चला दी। अंगुली तेजी से कटकर धरती पर गिर पड़ी। खून तेज गति से आंगन पर फैलने लगा। महाराणा एवं अन्य दरबारियों के सामने अंधेरा सा छा गया और चारों ओर चुप्पी फैल गई। कुछ क्षण तक किसी का साहस नहीं हुआ कि एक शब्द भी बोले या कुछ कहें, परन्तु शक्तिसिंह चुप्पी को बिखरते हुए बोले कि - "हां दाता, तलवार की धार तेज हैं, खूब मार करेगी।"


शक्तिसिंह कि यह हिम्मत देखकर सभी राजपूत सरदार दंग रह गए। स्वयं महाराणा भी आश्चर्यचकित हो गए। उन्हें शक्तिसिंह के इस कार्य पर खुश न होकर बहुत ही क्रोध आया और कहने लगे - "यह कार्य बहुत ही दुष्टतापूर्ण है, जब इसको अपने शरीर से ही प्रेम नहीं है, तब यह और किससे प्रेम करेगा? मैं इसका मुंह भी देखना नहीं चाहता हूं, इसे जेल में बंद कर दो, पता नहीं आगे यह क्या करेगा?" 


महाराणा उदयसिंह को क्रोध से तम-तमाते हुए देखकर किसी ने भी नादान शक्तिसिंह को बचाने का कोई प्रयत्न नहीं किया। उसी क्षण शक्तिसिंह को पकड़ने के लिए सिपाही आगे बढ़े, पर अभी भी शक्तिसिंह जी के चेहरे पर कोई दुःख नहीं था। वह खुशी-खुशी सिपाहियों के साथ चले गए। 


उसी दिन शाम को महाराणा ने पुनः दरबार लगाया। शक्तिसिंह को भी जेल से बुलवाया गया। शक्तिसिंह जब दरबार में आए तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता थी, यह देखकर सभी राजपूत सरदारों को आश्चर्य हुआ। महाराणा ने शक्तिसिंह को अपने पास आने का संकेत दिया। ज्योंही वह महाराणा के पास गए, महाराणा ने शक्तिसिंह को गले लगा लिया और कहा -"राजकुमार शक्तिसिंह, हम आपसे बहुत प्रसन्न हैं, हम आपकी परीक्षा लेना चाहते थे कि आप कितने बहादुर हैं? सचमुच में आप बड़े ही बहादुर हैं, और बहादुर व्यक्ति को अपने किये पर कभी भी पश्चाताप नहीं होता हैं।"

सारे दरबार में प्रसन्नता छा गई और सभी राजपूत सरदारों को शक्तिसिंह द्वारा किए गए कार्य पर बड़ा ही गर्व महसूस हो रहा था।

Post a Comment

0 Comments