देश, धर्म और संस्कृति के रक्षक राजपूत

देश, धर्म और संस्कृति के रक्षक राजपूत


#जो लोग कहते हैं कि #राजपूत हमेशा हारे और विदेशी शक्तियों का मुकाबला नहीं किया और उनके सामने झुक गए #उनके लिए यह पोस्ट


क्षत्रिय राजपूतों ने तो विदेशियों के विरुद्ध अपने प्राणों की आहुतियां देकर हमारे देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा की है, यदि वीर राजपूत समय समय पर देश और संस्कृति की रक्षार्थ अपने जीवन का बलिदान नहीं करते तो आज देश में इस्लाम का बोलबाला होता, ना तो ऊंचे शिखरों वाले मंदिर दिखाई देते और ना ही मंदिरों में आरती और शंख की ध्वनि सुनाई देती।

हमारे देश पर पहली शताब्दी से शकों और कुषाणों तथा चौथी शताब्दी ई. पूर्व से ही विदेशी यूनानियों के आक्रमण होते रहे और उनका राज्य भी देश में स्थापित हो गया लेकिन उनको उखाड़ने वाले क्षत्रिय राजपूत ही थे। विक्रमादित्य परमार जैसे वीर क्षत्रियों ने विदेशी शकों को मात देकर देश से बाहर खदेड़ा तो अर्जुनायन, नागवंशी और यौधेय क्षत्रियों ने विदेशी कुषाणों को मात दी और गुप्त क्षत्रिय ने तो उनका राज्य ही समाप्त कर दिया। बाद में जब विदेशी हुणों के आक्रमण हुए तब इनका मुकाबला भी क्षत्रिय (राजपूतों) ने ही किया और उनकी शक्ति को तीतर-बीतर कर दिया। 


हज़रत मुहम्मद की विक्रम संवत् 689 में मृत्यु के पश्चात अबुबक्रसिद्दीक खलीफा बना, उसके बाद उमर बिन खिताब विक्रम संवत् 691 में खलीफा बना। उसके समय में मुसलमानों की जबरदस्त सेना ने उम्र इबन उल आस के नेतृत्व में विक्रम संवत् 697 में मिश्र पर चढ़ाई की और वहां की संस्कृति, सभ्यता और नगरों को नष्ट कर दिया। इसके बाद अलेक्जैण्ड्रिया नगर के लाखों पुस्तकों वाले पुस्तकालय को जलाकर पानी गर्म किया और फिर इसके बाद यूरोप की सीमा तक विशाल मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना हो गई तब वहां की संस्कृति-सभ्यता और धर्म का भी सफाया हो गया। इसके थोड़े ही समय बाद इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए मुस्लिम सेना पूर्व की तरफ बढ़ी। सिंध के राजा चच पर आक्रमण हुआ। चचनमा में लिखा है कि अरब सेनापति मुगेरा अबुल आसी मारा गया और मुस्लिम सेना को पहली बार  हार का सामना करना पड़ा और इराक के हाकिम अबुमुशा असाकी ने अपने खलीफा को खत लिखा की सिंध का राणा तो अपने धर्म का पक्का है तो खलीफा ने उत्तर में लिखा कि उसके विरुद्ध जिहाद(धर्मयुद्ध) नहीं करना चाहिए तुम वापस सेना को लेकर आ जाओ।


खलीफा वलीद के सेनापति हारू ने बिलोचों को मुसलमान बना दिया। मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में मुस्लिम सेना ने राजा चच के पुत्र दाहिर पर 711 ई. में जबरदस्त आक्रमण किया, दाहिर के मारे जाने के बाद उसकी राणी ने युद्ध किया और जौहर हुआ। राजस्थान की पश्चिमी सीमा सिंध से मिली हुई थी। मुस्लिम सेना विजय करती हुई भारत के भीतरी भागों में घुस आई थी तब पुलकेशी द्वितीय (चालुक्य/सोलंकी) ने मुस्लिम सेना को भारत से दूर तक खदेड़ डाला और मुस्लिम शक्ति को तहस नहस कर दिया और समस्त विदेशी शक्तियों को बताया कि यह भारत है और इस पर आक्रमण करने वाले जीवित नहीं बचेगा। ग्वालियर के अभिलेख से मालुम चलता है कि नागभट्ट प्रतिहार राजपूत ने विक्रम संवत 740 के करीब म्लेच्छ सेना को देश से हटाकर देश की संस्कृति और सभ्यता की रक्षा की। 8वीं शताब्दी में कश्मीर देश के नागवंशी क्षत्रिय राजा चंद्रपीड़ पर अरबों ने आक्रमण किया और मुहम्मद हुसैन क़ासिम कश्मीर की सीमा तक बढ़ आया, तब देश की रक्षा खातिर चंद्रपीड़ लड़ा और अरबों को कश्मीर और देश में घुसने नहीं दिया। मेवाड़ के रावल खुमाण के समय अलमाम के नेतृत्व में मुस्लिम सेना बढ़ती हुई देश में दाखिल हो गई तब रावल खुमाण अपने साथ कई राजाओं को लेकर मुस्लिम सेना का मुकाबला किया और देश से विदेशी शक्तियों को बाहर खदेड़ा। 977 ई. में लाहौर के राजा जयपाल पर सुबुत्तगीन का आक्रमण हुआ, तब भारत देश की संस्कृति की रक्षा के लिए भारत के राजाओं ने संघ बनाया और डटकर मुकाबला किया और आक्रमणकारियों को दूर तक खदेड़ दिया और इस मुकाबले में अनेक राजपूतों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। 1009 ई. में जयपाल के पुत्र आनन्दपाल पर महमूद गजनवी का आक्रमण हुआ तब भी सैंकड़ों राजपूतों ने देश, धर्म और संस्कृति की रक्षार्थ अपने प्राणों की आहुति दी। मुहम्मद गजनवी ने नगरकोट (कांगड़ा), मथुरा, सोमनाथ आदि अनेक मंदिरों का विध्वंश किया और लूटा। इन भयंकर आक्रमणों का राजपूत भले ही कुशलता से सामना न कर पाए लेकिन वह चुपचाप बैठकर आक्रमण देखते नहीं रहे। बल्कि सैंकड़ों वीर राजपूत अपने देश, धर्म और संस्कृति की रक्षार्थ मर मिटे। महमूद गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण की सूचना भीम सोलंकी को देर से मिली परंतु फिर भी उन्होंने सेना संगठित की और वापस लौटते हुए गजनवी से मुकाबले के लिए तैयार हो गए। भीमदेव सोलंकी के पास मुस्लिम सेना से 8 गुना ज्यादा सेना थी। गजनवी को इस बात का जब पता चला तब वह भीम सोलंकी से भयभीत हो गया और सीधे रास्ते से न लौटकर संकटपूर्ण मार्ग से चला गया। जिसके कारण उसके बहुत से आदमी मारे गए। और भीमदेव सोलंकी ने गजनवी का पीछा कर सारा लुटा हुआ सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात, वापस ले लिए और मुस्लिम सेना  को सफाया किया तथा सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी करवाया। सीमावर्ती क्षेत्रों पर उस समय राजस्थान में चौहान, गहलोत और भाटी शासन कर रहे थे। तीनों ही वीरता के साथ विदेशी हमलों का मुकाबला करते रहे और देश, धर्म और संस्कृति को बचाते रहे। महाराज गज (भाटी यादव क्षत्रिय) ने 7वीं शताब्दी में गजनी के पास खुरासान बादशाह से टक्कर ली, महाराज गज ने पहले युद्ध में बादशाह की सेना को तीतर बीतर कर दिया, परंतु दूसरे युद्ध में गजनी पर खुरासान बादशाह का अधिकार हो गया। महाराज गज के पुत्र शालिवाहन ने वापस गजनी पर आक्रमण किया और बादशाह को हराकर, गजनी को जीतकर चारों दिशाओं में भाटी क्षत्रियों के गौरव को बढ़ाया। राजा भाटी के पुत्र मंगलराव ने मुसलमानों के हमले का डटकर मुकाबला किया और देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा की। महमूद गजनवी ने 1026 ई. में जब भारत पर आक्रमण किया तब बच्छराय भाटी ने मुकाबला किया और महमूद गजनवी और उसकी सेना को देश से बाहर खदेड़ दिया। विक्रम संवत् 1233 के क़रीब यवन सेना अनहलवाड़ (पाटन) पर चढ़ आई। तब लोद्रवा के यदुवंशी भाटी राजपूत राजा भोजदेव जिनकी पदवी "उत्तर भड़ किवाड़ भाटी" थी। अतः यवनों के आक्रमण को रोकने के लिए उन्होंने अपने चाचा जैसलदेव को पत्र लिखा :-

"भड़ किवाड़ उतराद था भाटी झेलण भार। वचन राखा विजराज रौ, समहर बांधा सार।।

तोड़ धड़ तुकराण री, मोडां खान मंगेज। दाखै अनमै भोजदे, जादम करै न जेज।।"


उसके बाद जैसलदेव सेना लेकर लोद्रवा आए और राजा भोजदेव के नेतृत्व में मात्र मुट्ठी भर भाटी राजपूत युद्ध मैदान में लाखों यवनों के खिलाफ उतरे और यवन सेना का और उसके सेनापति मंगेज खां का डटकर मुकाबला किया और यवन सेना को भारत देश से बाहर खदेड़ दिया और राजा भोजदेव सहित कई भाटी राजपूत इस युद्ध में देश व संस्कृति की रक्षार्थ मर मिटे। 11वीं शताब्दी में दुर्लभराज चौहान भारत के सबसे शक्तिशाली राजपूत राजा थे। फरिश्ता में लिखा है कि उसने गजनी के मुस्लिम शासक को मारवाड़ में आगे बढ़ने नहीं दिया। दुर्लभराज तृतीय ने भी म्लेच्छों को देश में आगे बढ़ने से रोका। अजमेर के संस्थापक अजयराज चौहान ने मुस्लिमों का डटकर मुकाबला किया और देश में उन्हें पांव जमाने नहीं दिया। अर्णौराज चौहान के समय मुस्लिम आक्रमणकारी अजमेर तक बढ़ आए, तब अजमेर नगर के बाहर भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में अर्णोराज चौहान ने मुस्लिम सेना को बुरी तरह नष्ट कर दिया। अजमेर से गजनी जाने वाले मार्ग पर, पूरे रास्ते पर मुस्लिम सैनिकों के मरे हुए शव पड़े हुए थे, इतना भयंकर युद्ध चौहानों ने मुस्लिमों के विरुद्ध किया था। राजा अर्णौराज ने आनासागर झील का निर्माण करवाया और युद्धभूमि को पवित्र किया। विग्रहराज चौहान विसलदेव ने भी बबेरा(खेतड़ी) के पास खुशरोशाह के हमले का मुकाबला किया और उसका दमन किया, इन्होंने हिंदू प्रदेशों को म्लेच्छों से छिन लिया और म्लेच्छों को हिंदुस्तान से बाहर खदेड़ दिया। पृथ्वीराज प्रथम और पृथ्वीराज द्वितीय ने भी मुसलमानों से संघर्ष किया और देश पर विदेशी शक्तियों की सत्ता जमने नहीं दी। इसके बाद पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने भी मुसलमानों से संघर्ष किया और  17 बार मुहम्मद गौरी को पराजित किया और अंत में 1192 ई. में तराइन के मैदान में पृथ्वीराज चौहान को धोखे से हार का सामना करना पड़ा और देश पर विदेशी सत्ता कायम हुई।  इसके बाद भी धर्म, देश और संस्कृति कि रक्षार्थ, राजपूत इन विदेशी हमलावरों का मुकाबला करते रहे और बलिदान देते रहे। धर्म व संस्कृति की रक्षार्थ यह राजपूतों के बलिदान की परंपरा अंग्रेजी सत्ता तक बराबर बनी रही। इन राजपूत वीरों ने देश, धर्म और संस्कृति-सभ्यता की रक्षार्थ जितना बलिदान दिया है, इन बलिदानों को भारतवासी कभी नहीं भूल सकते।

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