भंवर जूझारसिंह शेखावत ठिकाना सुलताना - सर कटने के बाद भी युद्ध लड़ने वाला राजपूत योद्धा

भंवर जूझारसिंह सुलताना (शेखावत):-

यह घटना मांडण के युद्ध के समय की है। नवलगढ़ के अधिपति - नवलसिंह शेखावत और भरतपुर के जवाहरमल जाट के बहुत अच्छे संबंध थे। इन्हीं अच्छे संबंधों के बदौलत ही भरतपुर के जाट शेखावत सेना के पक्ष में मांडण के युद्ध में सम्मिलित हुए थे। इस माण्डण के युद्ध में शेखावत सेना की ओर से सर्वाधिक वीरता से लड़ने वाले योद्वाओं में जोरावर सिंह के बेटे सुलताना ठिकाने के अधिपति जबर वीर हाथीसिंह, मन्ड्रेला ठिकाने के दौलतसिंह और टांई ठिकाने के सालिमसिंह थे।संवत् 1831 में अराजकता के माहौल में कालेखां बलोच, नजबकुलीखां और जर्मन सेनापति समरू, यह तीनों जर्मन सेना लेकर आए और कांटा खेड़ी, कानूड़ व सिंघाणा को जीतते हुए आगे बढ़ रहे थे। वह खेतड़ी पर हमला करने वाले थे। लेकिन जर्मन सेनापति समरू जो पहले जाट सेना के साथ मावंडा-मढोली के युद्ध में शामिल था, उसने युद्ध में भोपाल सिंह खेतड़ी पर चढ़ाई के लिए काले खां व नजबकुलीखां को समझाया कि अभी खेतड़ी नरेश से उलझना ठीक नहीं है, क्योंकि खेतड़ी नरेश हमसे ज्यादा ताकतवर है और खेतड़ी नरेश के पास हमसे ज्यादा संख्या में सैनिक है। जर्मन सेनापति समरू ने अपनी राय दी कि इन शेखावतों की शक्ति को कम करने के लिए अलग-अलग छोटे-छोटे ठिकानों पर हमला कर कब्जे में किया जाना चाहिए।इसलिए उनकी सेना सिंघाणा से सीधी शेखावतों के ठिकाने सुलताना पहुंची। इस समय सुलताना के ठाकुर हाथीसिंह थे, हाथीसिंह जी एक छोटे से ठिकाने सुलताना के धणी होने के साथ बड़े बहादुर और वीर थे और चारों दिशाओं में इनकी बड़ी धाक थी। जब हाथीसिंह जी को इस बात की जानकारी मिली की सुलताना पर हमला होने वाला है, तब समस्त क्षत्राणियों को रथों में रवाना कर झूंझनूं पहुंचा कर, झूंझनूं से और सेना लाकर शत्रुओं से दो-दो हाथ करने की योजना बनाई गई।इधर नजबकुलीखां ने सुलतानागढ़ के दक्षिण में कब्रिस्तान में ऊंचे टीले पर मोर्चा जमाया। हाथीसिंह जी के युवा पोते जुझार सिंह, जो भानीसिंह के पुत्र थे, उन्होंने आव देखा न ताव और बिना किसी का इंतजार किए ही पास में ध्यानदास की बगीची के पश्चिम में बड़ी सी जाल थी, उसमें मोर्चा लगाकर बन्दूक भरकर वहां बैठ गये। मुगलिया सेना का उद्देश्य गढ़ को ध्वस्त करना था। ज्योंही तोपची तोप तैयार करने आता, जुझारसिंह जी अपनी बन्दुक से उसे मार देते। इस प्रकार कई तोपची मारे गये। यह देखकर काले खां को बड़ी चिंता हुई। परन्तु सामने कोई आदमी नजर नहीं आता था। इसी दरमियान नाहर वाले कुंए का पानी कम हो गया, तो ध्यानदास की कुई से पानी ले जाना शुरू कर दिया था। इसी दौरान भिश्ती की नजर जाल पर बैठे जुझारसिंह पर पड़ी और उसने कालेखां व समरू को बताया की इस जाल में बैठा व्यक्ति ही सभी तोपचियों को मौत के घाट उतार रहा है। तब कालेखां के आदेश पर मुगलिया सेना का एक सैनिक छिपता-छिपाता आया और तीर का निशाना जुझारसिंह को बनाया। जुझार सिंह का ध्यान उस समय सिर्फ तोप पर ही था। इसलिए तीर सीधा आकर सीने में लगा। उस वीर जुझारसिंह ने सीने से तीर निकालकर, जाल से नीचे कूद कर अपनी तलवार लेकर मुगल सेना पर टूट पड़ा। काफी सारे दुश्मनों को खत्म करने के बाद जुझारसिंह काफी दुश्मनों से घिर गए, तब किसी मुगल ने पीछे से वार कर जुझारसिंह का सिर कलम कर दिया। फिर भी उस वीर जुझारसिंह का धड़ बिना सिर के ही तलवार चलाता रहा और मुगलों को मौत के घाट उतारता रहा।कालेखां यह सब देखकर घबरा गया और भागकर छिप गया और कहा कि यह बिना सिर का काफिर हम सबको मार देगा। इस अभियान में बीकानेर सेना का सेनापति बख्तावरसिंह मोहता भी उनके साथ था, उसने कहा कि इसके धड़ पर गाय के खून के छिंटे फेंको, तब ही यह धड़ शांत हो सकता है अन्यथा यह मंजर ऐसा ही चलता रहेगा। एक मुसलमान सैनिक ने अपने पास में ही खड़ी एक गाय को मारकर, उसका खून एक बरतन में डालकर दूर से ही इस धड़ पर फेंका तब जाकर कहीं जूझारसिंह का धड़ शांत हुआ। तो इस प्रकार जुझारसिंह ने अपना नाम सार्थक करते हुए जुझार होकर अपना नाम इतिहास में अमर कर लिया। इसके बाद कालेखां ने तुरंत ही नजबकुलीखां से विचार कर सुलताना खाली कर दिया और उन्होंने उदयपुरवाटी की तरफ कूच किया। उन्हें मालूम हो गया कि इन राजपूतों से लड़ना हमारे बस का नहीं है, यह राजपूत बिना सिर के भी युद्ध कर लेते हैं, और पूरे युद्ध मैदान में हड़कंप मचा देते हैं, और मात्र इस एक राजपूत ने ही हमारी सेना में हड़कंप मचा दिया,  जबकि गढ़ सुलताना में तो हजारों की संख्या में राजपूत नंगी तलवारें लेकर हमसे युद्ध करने का इंतजार कर रहे हैं और इसके साथ ही हाथीसिंह भी झूंझनूं से सेना लेकर आ रहा है तो ऐसी स्थिति में मुसलमानों ने राजपूतों से ही युद्ध किए बिना ही सुलताना छोड़कर पलायन कर गए। आज भी सुलताना में किसी क्षत्रिय के यहां शादी होती है तो दूल्हा-दूल्हिन की गठजोड़े से जूझारसिंह के यहां जात लगती हैं और सुलताना के क्षत्रियों में भंवर जुझारसिंह की काफी मान्यता है। धन्य है राजपुताने की यह भूमि जहां पर जूझारसिंह जैसे वीरवर योद्धाओं ने जन्म लिया और अपना नाम इतिहास में अमर किया।यह एक विडम्बना ही रही है कि जहां इस वीरवर योद्धा जूझारसिंह की वीरगाथा को हमारी पाठयपुस्तकों में जगह मिलनी चाहिए थी, वहां इनकी वीरगाथा अतीत के पन्नो में धुंधली होती जा रही है। ✍️✍️दैवेन्द्र सिंह गौड़ ✍️✍️

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