राव बीकाजी द्वारा जोधपुर से बीकानेर लाए गए पैतृक राज्य चिन्ह - "राठौड़ों की टीकाई पन की चीजें"



राव बीका जी का जन्म राव जोधा जी की रानी 'नौरंगदे' सांखली के गर्भ से विक्रम संवत् 1495. श्रावण सुदी पुर्णिमा को हुआ था। राव बीकाजी, राव जोधा जी के पाटवी पुत्र थे, परंतु राव जोधा जी अपनी चहेती रानी 'जसमादे' के पुत्र राव सूजा को ही राज्य देना चाहते थे, बीकाजी को नहीं और विक्रम संवत् 1522 के दिन दशहरे उत्सव पर राव जोधा के  भाई कांधल जी अपने भतीजे बीकाजी के साथ टहल रहे थे, तब जोधाजी ने मजाक में कहा कि 'लगता है कांधल अपने भतीजे को कोई नया राज्य दिलावेंगे'। यह बात बीकाजी को चुभ गई और फिर बीकाजी, कांधल जी, बेला पड़िहार और नापोजी सांखला के साथ जोधपुर त्याग दिया। उस वक्त बीकाजी की उम्र 27 साल थी।
'राती घाटी' और 'बीका टेकरी' राव बीका ने राती घाटी के उपर ही गढ़ की स्थापना की थी। गढ़ की नींव मां करणीजी के हाथों लगवाई थी। करणीजी को जिस जगह ठहराया था, उसे 'भुवाजी की साल' कहते हैं।

"राठौड़ों की टीकाई पन की चीजें" (पैतृक राज्य चिन्ह) राव बीकाजी द्वारा जोधपुर से लाए गए थे।

1. *देवी नागणेची की चांदी की मूर्ति* जो मंदिर में रखी हुई हैं। बीकाजी ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही महिषासुर मर्दन की अठारह भुजाओं वाली नागणेची माता की मूर्ति जोधपुर से लाकर मन्दिर में स्थापित की थी। राव बीका की मृत्यु विक्रम संवत् 1561 को अश्विनी शुक्ला तृतीया को हुई थी।

2. *लक्ष्मीनारायण की मूर्ति* - यह मूर्ति अभी तक जूनागढ़ किले के हर मंदिर में है। लक्ष्मीनारायण जी की दूसरी बड़ी अद्भूत भव्य चार भुजा मूर्ति गढ़वार मंदिर में स्थापित की गई। राती घाटी पर बने गढ़ के ठीक सामने यह मंदिर है।

3. *सिंहासन* - बीकानेर का सिंहासन कन्नौज के महाराजाओं का है, जो 725 साल पहले राठौड़ वहां से लेते आए थे। दशहरा आदि विशेष उत्सवों पर बीकानेर महाराजा व महारानी साहिबा अभी भी इस पर विराजते हैं।

4. *छत्र*

5. *चंवर*

6. *राव जोधा की तलवार*

7. *राव जोधा की ढाल*

8. *हरभू जी सांखला की कटार*

9. *करड़* - यह एक छोटा सा बक्सा है, जो पवित्र माना जाता है। इस पर एक लेख हैं कि वह राव सिंहाजी के पोते राव धूहड़ की सेवा पूजा में था। यह जूनागढ़ में देवी नागणेचीजी के देवी द्वारा मन्दिर में रखा हुआ है।

10. *दक्षिणावर्त शंख* - जो अब नागड़ के हरमंदिरजु में रखा गया है।

11. *भंवर ढोल* - यह राव चूड़ा का थवर ढोल हैं।

12. *बैरीशाल नगारा* - यह जाम्भोजी का दिया हुआ बताया जाता है। यह जाम्भोजी, बिश्नोई धर्म के प्रवर्तक संत और पंवार राजपूत थे।

13. *भुजाई देग* - भुजाई देग 2 है, जिसमें एक में साबूत मूंग पकाएं जाते थे और दुसरे में चावल पकाएं जाते थे।
सूर्यास्त होने के समय जूनागढ़ के बीच में चौगान में दो दरबारी मूंग-चावल लाते और ऊंची आवाज लगाते - भुजाई लेवो तो सरदारा बीकानेर पधारो - फिर मूंग-चावलों को जो भी बच्चे-बडे़ खड़े होते उनमें बांट देते थे।

14. *दल सिंगार घोड़ा* - इस पर सिर्फ राजा ही सवारी कर सकता था। तीज - त्यौहार, जैसे दशहरे आदि अवसरों पर इन घोड़ों को सोने चांदी के गहने पहनाकर, खरी जारी की काठी, पागड़े आदि से साज-संवार कर सवारी में साथ ही दर्शनार्थ ले जाया जाता था। इसकी नित्य पूजा होती थी। इसका ठान कभी भी खाली नहीं रहता था।

15. *कोडमदेसर का भैंरू* - राव बीकाजी बचपन से ही भैंरू उपासक थे। इसलिए जोधपुर छोड़ते वक्त बीकाजी ने मंडोर से भैंरूजी की मूर्ति (देवली) गाड़े में डालकर अपने साथ ले आए थे। कोडमदेसर के गौरे भैंरु की स्थापना भी राव बीकाजी ने ही की थी। करणीजी की यह आज्ञा थी कि तूं भैंरू उपासक जिस दिन भैंरूजी की मूर्ति को कोडमदेसर में स्थापित कर देगा, उसी दिन से तूं अपने राज्य की स्थापना समझ लेना।
✍️✍️ दैवेन्द्र सिंह गौड़ ✍️✍️

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