Brave Rajput
गौरक्षक पनराज जी भाटी - वो योद्धा जो सिर कटने के बाद भी युद्ध लड़ता रहा
महारावल विजयराज लांझा, जिनको उत्तर भड़ किवाड़ की पदवी मिली थी, उनके दुसरे पुत्र राहड़, राहड़ के भूपत, भूपत के अरड़क, अरड़क के कांगण और कांगण के पुत्र वीर पनराज जी हुए, पनराज जी का जन्म माता देवकंवर की कोख से 13वीं सदी के अंतिम चरण में हुआ। पनराज जी जैसलमेर महारावल घड़सी जी के समकालीन थे तथा उनके प्रमुख सलाहकार थे। क्षत्रिय राजपूत संस्कारों से विभूषित पनराज जी बचपन से ही होनहार, विशिष्ट शौर्य से भरपूर और पराक्रम की प्रतिमूर्ति थे। पनराज जी ने महारावल घड़सी जी के साथ बंगाल के युद्ध में भाग लेकर गजनी बुखारे के बादशाह के इक्के की मल्लयुद्ध में उसकी भुजा उखाड़कर उसे पराजित कर अपने अद्भूत शौर्य का परिचय दिया, जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने घड़सी जी को 'गजनी का जैतवार' का खिताब दिया।
शूरवीर पनराज जी भाटी का बलिदान
जैसलमेर और बहावलपुर दो पड़ौसी राज्य थे। वर्तमान समय में बहावलपुर पाकिस्तान में है। बहावलपुर के नवाब की सेना आये दिन जैसलमेर राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रो में डकैती और लूटपाट करती थी। परन्तु कभी भी जैसलमेर के भाटी वंश के शासको से टकराने की हिम्मत नही करती थी। यह घटना उन्हीं दिनों की है, काठौड़ी गांव जिला जैसलमेर में वीर पनराज जी की धर्मबहिन पालीवाल ब्राह्मण बाला रहती थी। एक दिन पनराज जी अपनी धर्मबहिन से मिलने काठौड़ी गांव गये तो उन्होंने देखा कि कई मुसलमान वहां लूटपाट करके उनकी गायों को ले जा रहे थे। लोगों की चीख-पुकार सुन और अपनी धर्म बहिन को रोते देखकर उस रणबांकुरे पनराज भाटी की आंखें लाल हो गई और वह भंयकर क्रोधित हो गए। वीर पनराज जी ने अपनी बहिन ओर समस्त गांव वालों को वचन दिया कि मैं तुम्हारी सारी गायों को वापस ले आऊंगा। पनराज जी की ब्राह्मण बहिन बाला ने पनराज जी को युद्ध में जाने से रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन यह तो क्षत्रियता की परीक्षा थी, जिसमें वीर पनराज भाटी जैसा रणबांकुरा कैसे पीछे हट सकता था। शूरवीर पनराज जी अपने नवलखे घोड़े तुरंग पर सवार होकर, जिधर दुश्मन गये थे, उसी दिशा में पवन वेग से आगे बढ़ चले। दुश्मनों की दिशा की तरफ आगे बढ़ते हुए पनराज जी भाटी का शत्रुओं के साथ घमासान युद्ध छिड़ जाता है, शूरवीर पनराज जी भाटी की तलवार दुश्मनों के रक्त से अपनी प्यास बुझाती हुई, उन्हें यमलोक भेज रही थी। वीर पनराज जी भाटी के हुंकारों से सारा वातावरण गुंजायमान हो रहा था। पनराज जी के रणकौशल से शत्रु सेना में भगदड़ मच गई, मुसलमान मौत को अपने नजदीक देखकर गायों को छोड़कर भागने लगे, वीर पनराज जी सारी गायों को मुक्त करवाकर विजयी होकर वापस लौट रहे थे। शूरवीर पनराज जी की ब्राह्मण धर्मबहिन बाला अपने भाई की जीत की खुशी में फूली नहीं समा रही थी, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। विधाता को कुछ और ही मंजूर था, एक तुर्क मुसलमान ने छल कपट से काम लेते हुए पीछे से वार कर वीर पनराज जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन वीर पनराज जी भाटी का बिना सिर का धड़ अपने दोनों हाथों से तलवार चला रहा था और शत्रुओं के लिए प्रलय साबित हो रहा था। सिर कट जाने के बाद भी तुर्कों को मौत के घाट उतारता हुआ शूरवीर का धड़ बारह कोस दूर बहावलपुर (पाकिस्तान) तक चला गया। वीर पनराज जी की तलवार रणचण्डी का रूप धारण कर शत्रुओं के रक्त से अपनी प्यास बुझा रही थी। तुर्कों में त्राहि-त्राहि मच गई थी और वह अल्लाह-अल्लाह चिल्लाने लगे, तब किसी वृद्ध तुर्क ने सलाह दी कि वीर पनराज जी के शरीर पर नीला रंग छिड़क दिया जाए और ठिक ऐसा ही किया गया, फिर वीर पनराज जी का शरीर ठंडा पड़कर धरती मां की गोद में आ गिरा। पनराज जी का धड़ जहां शांत हुआ, बहावलपुर के उसी स्थान पर पनराज जी का स्मारक बना हुआ है, जहां मुस्लिम उनकी 'मोडिया पीर' और 'बंडिया पीर' के नाम से पूजा करते हैं और चादर चढ़ाते हैं। प्रणवीर पनराज जी क्षात्रधर्म का पालन करते हुए गौ माता और ब्राह्मणों की रक्षार्थ अपना बलिदान दिया तथा अपने पूर्वज विजयराज लांझा से प्राप्त पदवी 'उत्तर भड़ किवाड़ भाटी' को गौरवान्वित किया। कहते हैं कि महारावल घड़सी जी को जैसलमेर की राजगद्दी पर बिठाने में पनराज जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी, घड़सी जी ने पनराज जी का सम्मान करते हुए उन्हें सोनार दुर्ग के उत्तर में सूली डूंगरी पर स्थित बुर्ज प्रदान की। महारावल घड़सी ने पनराज जी को 45 कोस की सीमा में घोड़ा घुमाने पर उन्हें 45 कोस की जागीर दी, वो क्षेत्र आज के समय में राहड़की के नाम से जाना जाता है, तथा यहां राहड़ भाटियों के गांव स्थित है। स्वयं पनराज जी द्वारा निर्मित पनराजसर तालाब, जहां उनका सिर कटा था। उस स्थान पर पीले रंग की मूर्ति स्वत: प्रकट हुई, इसी स्थान पर साल में दो बार भाद्रपद शुक्ल पक्ष और माघ सुदी शुक्ल पक्ष दशम को भव्य मेला लगता है तथा हजारों श्रद्धालु यहां मन्नत मांगने आते हैं और पनराज दादाजी उनकी मुरादें पूरी करते हैं।
पनराज जी भाटी के संबंध में एक दोहा प्रचलित है :-
रज उड़ी रजथांण रा, ग्रहया नर भुजंग।
दुश्मन रा टुकड़ा किया, रंग राहड़ पन्नड़ रंग।।
यह एक विडम्बना ही रही है कि इस शूरवीर पनराज जी भाटी की शौर्य गाथा को जहां इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखी जानी चाहिए थी, वो स्थानीय चारण और भाट कवियों तक ही सीमित रह गई। वीर पनराज जी और इनके जैसे कई राजपूत वीर योद्धा हुए जिसके बारे में हमें जानकारी ही नहीं है, और ना ही ऐसी शौर्यगाथाओं को हमारी पाठयपुस्तकों में जगह मिल पाई।



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