मेवाड़ के भीष्म पितामह - रावत चूंडा जी


रावत चूंडा जी 🙏🔥🚩

राजपूताना का इतिहास तलवारों से लिखा जाता रहा है लेकिन बात जब रावत चूंडा जी की, कि जाती है तो उन्होंने इस इतिहास को अपनी तलवार के साथ-साथ अपने त्याग और बलिदान से लिखा है। संवत 1395 ईस्वी में मेवाड़ के महाराणा लाखा की महारानी लखमादे चौहान की कोख से एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम #चूंडा रखा गया। तत्कालीन परम्परा के अनुसार रावत चूंडा जी अपने पिता के बाद महाराणा के पद का अधिकारी थे। लेकिन नियति चूंडा जी के साथ कुछ अलग ही इतिहास लिखना चाहती थी। बताया जाता है कि चूंडा बचपन से ही पितृ भक्त थे। इसमें कोई दो राय नहीं थी कि चूंडा जी को मेवाड़ की राजगद्दी संभालनी थी, लेकिन जवानी की दहलीज पर खड़े रावत चूंडा के लिए, मंडोर के राव रणमल एक विवाह प्रस्ताव लेकर आये। राव रणमल चाहता थे कि मेवाड़ का भावी शासक उसकी बहन हंसाकंवर से शादी कर ले। यह प्रस्ताव भरे दरबार में महाराणा लाखा के सामने रखा गया। इसी दौरान मजाक – मजाक में महाराणा लाखा ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा कि उन्हें मालूम है कि ये प्रस्ताव मेरे बेटे के लिए आया है। इस उम्र में आखिर हमसे कौन विवाह करेगा। यही बात कहीं न कहीं चूंडा जी के दिल में घर कर गई। उन्हें लगा कि शायद महाराणा की इच्छा अभी भी शादी करने की है। इसलिए चूंडा जी ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए राव रणमल से कहा कि वो अपनी बहन का विवाह महाराणा लाखा से कर दें। राव रणमल भी अपनी बहन की शादी महाराणा लाखा से करने को तैयार थे, लेकिन उसे इस बात का पता था कि उनकी बहन महाराणा लाखा की रानी तो बनेगी, लेकिन उसकी कोख से जन्म लेने वाला बालक मेवाड़ का शासक कभी नहीं बन पायेगा। आखिर मेवाड़ की राजगद्दी पर तो महाराणा लाखा के बाद चूंडा जी का ही अधिकार है। राव रणमल की इस बात का जवाब देते हुए चूंडा जी ने भरे दरबार में भीष्म प्रतिज्ञा की, कि मैं आजन्म मेवाड़ के महाराणा का सेवक बनकर रहुंगा और मेरे वंशज कभी भी मेवाड़ की राजगद्दी पर हक नहीं जतायेंगे। इस भीष्म प्रतिज्ञा के बाद महाराणा लाखा का हंसाकंवर के साथ विवाह कर दिया गया। चूंडा जी द्वारा सत्ता त्याग के बारे में राजस्थानी गीतों, बड़वों व राणीमंगों की पोथियों में कुछ अलग-अलग रूप में मिलता है। एक महान कवि ने रावत चुंडा जी के लिए कहा है कि
🚩 चंवरी चढ़ लाखो फिरे, फिरे बीनणी लार।
चूंडा री कीरत फिरै, सात समुंदरा पार।🚩

हंसाकंवर की कोख से जन्में राणा मोकल का राजतिलक महाराणा लाखा की मृत्यु के बाद बहुत कम उम्र में मेवाड़ के महाराणा के रूप में खुद चूंडा जी ने अपने अंगूठे को चीरकर रक्त की बूंद से राजतिलक किया था। ऐसा नहीं है कि चूंडा का यही एक बलिदान उन्हें इतिहास में अमर करता है।

इतिहास बताता है कि मोकल के राजतिलक के बाद उन्हीं के मामा राव रणमल ने षडयंत्रपूर्वक चूंडा जी को मेवाड़ से बाहर निकलवा दिया और मेवाड़ की गद्दी पर कब्जा कर लिया। निर्वासित जीवन जी रहे चूंडा जी मांडू के सुल्तान होशंगशाह के पास पहुंचे। इसी होशंगशाह ने चूंडा जी की वीरता से खुश होकर उन्हें “रावत” की उपाधि दी। बताया जाता है कि बाद में महारानी हंसा कंवर के बुलावे पर रावत चूंडा जी फिर से मेवाड़ पहुंचे और उन्होंने राव रणमल का अंत कर, एक बार फिर से मेवाड़ की सत्ता पर महाराणा के रूप में मोकल जी को विराजमान किया। ‌

🚩लाखा स्वर्ग सिधारता, मोकल बांधी पाग।
चित्रकूट रक्षा कारण, चूंडा बांधी खाग।🚩

इतिहास इसके बाद रावत चूंडा जी को लेकर ज्यादा जानकारियां नहींं देता। शोधकर्ता बताते हैं कि 1440 ईस्वी में अहमदशाह और महमूद खिलजी की संयुक्त सेना ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया। उस दौरान रावत चूंडा ने हरावल के रूप इस युद्ध की अगुवाई की तथा मेवाड़ी सेनानियों ने इस संयुक्त सेना को हराने में कामयाबी हासिल की, रावत चूंडा ने इसके बाद 1442,1443 और 1446 तक महमूद खिलजी द्वारा लगातार किये गये आक्रमणों से मेवाड़ को सुरक्षित किया। मेवाड़ की नीति के अनुरूप ही रावत चूंडा और महाराणा कुंभा ने मंडोर पर आक्रमण किया। इस युद्ध में चूंडा जी के तीन पुत्र कुंतल, मंजा और सुवा रणखेत हुए।
‌महाराणा के आदेश पर रावत चूंडा ने कई युद्ध विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ भी लड़े। रावत चूंडा के इस गौरवशाली इतिहास का अंत यहीं नहीं होता। इसी बीच उन्होंने कपासन, शिवपुत्र, पाली और मंडोर पर कई बार भागते हुए राव रणमल के पुत्रों के साथ युद्ध किया। कुंभा ने 56 युद्ध लड़े और एक भी नहीं हारा कहा जाता है कि यह सारा श्रेय चुंडा जी को ही जाता है। चूंडा के वंशज चूण्डावत कहलाये। चुण्डावतों ने मेवाड़ और महाराणा की सेवा में कई कीर्तिमान स्थापित किये सांगा, जग्गा, पत्ता, ऐसे चुंडावतों में कही महान योद्धा हुए जो कंधे से कंधा मिलाकर जो भी जिस समय महाराणा रहे अपना पराक्रम उनके साथ लगाकर मेवाड़ की आन बान शान के लिए बलिदान हो गए और कई मौके ऐसे भी आये जब चूंडा के बाद के पाटवी वंशजों को मेवाड़ के राजसिंहासन पर कब्जा करने का मौका मिला। लेकिन चूण्डावतों ने रावत चूंडा की भीष्म प्रतिज्ञा को निभाते हुए राजसिंहासन की रक्षा अपने प्राणों की आहुति देकर की और यही वजह थी कि मेवाड़ की सेना में चूण्डावतों को हरावल का अधिकार वंशानुगत दिया गया।
जय एकलिंगजी
जय मेवाड़
जय जय राजपुताना

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