महावीर योद्धा झाला रायसिंह जी (रायसंगजी)


----- झाला रायसिंह -----

झाला रायसिंह काठीयावाड़ के धांग्रधा रियासत के राजा थे, रायसिंह जी झाला अकबर के आमंत्रण पर दिल्ली गये थे ,वहां उन्होने अकबर के एक शक्तिशाली मल्ल (पहलवान) को अपने हथेली के पंजे से पटक के मार दिया। पूर्व घटना को देखे तो, कच्छ के साहेबजी जाडेजा, अपने मित्र ध्रोल के जसाजी जाडेजा की युद्ध मे हुई हार और म्रुत्यु का बदला लेने भारी सैन्य के साथ रायसिंह जी की रियासत धांग्रधा पर चढ़ाई कर दी,और रायसिंह जी अपनी सेना लेकर उनके मार्ग मे ही आ पहुंचे, माळीया की युद्ध भुमि मे दोनो सेनाओं मे भारी संग्राम छिड़ गया और लडाई का परिणाम साहेबजी के पक्ष मे रहा ‌। मकनभारती गोंसाई का साधु संघ वहां से निकल रहा था, उन्होने घायल रायसिंहजी का उपचार किया ओर अपने साथ दिल्ली ले गए । रायसिंह दिल्ली मे थोड़े दिन अकबर के दरबार मे रहे, उस समय एक हाथी उनको मारने की नीयत से आया तब रायसिंहजी ने हाथी के कान पर हाथ से प्रहार कर दिया जीससे हाथी भाग खडा हुआ। जिसका एक दोहा है, “हाथी उपर हाथ पडता रायसिंहरो, शाह तणे दिल साथ, दिल्ली आखी डगमगी।” एकबार अकबर के जन्मदिन के महोत्सव के आमंत्रण पर रायसिंहजी दिल्ली गये। रायसिंहजी झाला, भले पधार्या भुपति; हळवदरा शिरताज, चौदश प्रसरी कीरती । मकनभारती के आदेश पर रायसिंह जी राजसी वस्त्र छोड गेरुआ वस्त्र धारण करते थे और वे कद मे भी मध्यम ही थे, यह देखकर अकबर के एक कदावर मल्ल(पहलवान) को रायसिंह जी के साथ मश्करी करने की सोची और कहा कि ऐसे राजा क्या राज करता होगा ?

इससे झाला रायसिंह क्रोधित हो उठे और रायसिंह जी ने मल्ल कुश्तीबाज, पहलवान को चेताया कि वह अपना मुह बंद कर दे वरना परिणाम उसे दुष्परिणाम भुगतान होगा । मल्ल काफी समय से कुश्ती लडने के लिये बेचैन था, इसलिए उसने रायसिंह को द्वंद युद्ध की चुनौती दी और फिर मल्ल और रायसिंह जी दोनों अकबर के दरबार में पहुंचे और दोनों के बीच मुकाबला शुरू हुआ और मल्ल तलवार निकालने ही जा रहा था, कि रायसिंहजी ने फुर्ती से उसको अपने हाथ के पंजे से पकडकर मल्ल को पटक कर एक वार में ही मार दिया और इस पराक्रम से सभी हतप्रभ रह गये । रायसिंहजी के बाद उनके पुत्र चंन्द्रसिंहजी गद्दी पर बैठे और कुछ पीढ़ी उपरांत १७३० मे रायसिंह नाम से और एक झाला राजवी हुए जिन्होने धांग्रध्रा का किला बनाया और कुछ समय वहा रहे भी, और उन्होने अपने नाम से “रायसिंहनगर” गांव भी बसाया। रायसिंह के बाद गजसिंह और उनके बाद जसवंतसिंहजी जीन्होने १७८१ मे “हळवद” से धांग्रध्रा राजधानी स्थापित की। काठीयावाड़ मे झाला राजपुतो के धांग्रध्रा, वांकानेर, लींबडी, वढवाण, चुडा, जैसे प्रमुख राज्य थे और इस प्रदेश को “झालावाड़” कहा जाता है और राजस्थान मे भी “जालावाड” है ।


  • अंत में बस यही कहना चाहूंगा कि इस वीर योद्धा की वीरता को सादर नमन है ‌। 🙏🤠🚩

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