Ajaypal Chauhan
शूरवीर अजयराज जी चौहान, एक ऐसा योद्धा जो बिना सर 600 किलोमीटर तक युद्ध करते हुए दुश्मनों को खदेड़ने वाला राजपूत
ऐसी अनुठी वीरता जो और कहीं देखने को ना मिले ।अजमेर पर चौहान राजवंश का राज था, चौहानों ने ही अजमेर बसाया था । तारागढ़ व गढ़ बिठली जैसे नामों से जाना जाने वाला ये राजपूत शहर बड़ा प्राचीन था और इसकी गौरव गाथा भी बङी समृद्ध रही है ।अजमेर के बीच झील और पहाड़ियों से घिरा यह शहर उस काल में भी हर किसी को रोमांचित कर देने वाला था, तो एक तरफ ऊंची पहाड़ी पर बना सुदृढ़ किला चौहान वंश के यश और गौरव का बखान करता था । इस तरह की भव्यता और सुन्दरता होते हुए, किसी का मन राज-काज व मोह माया से उठकर भगवान कि भक्ति में लग जाना एक सच्चे क्षत्रिय तक ही सीमित है, हर कोई कर पाये यह संभव नही है । राजपूत जाति मे कभी भी इतिहास लेखन कि परम्परा नही रही थी, इसीलिए इस गौरवगाथा का समयकाल बता पाना काफी कठिन है । यह गौरवगाथा है अजयराज जी चौहान कि, जब उस समय बाहरी आक्रमणकारी भारत में प्रवेश कर चुके थे, और उन आक्रमणकारियों का मुख्य उद्देश्य स्वयं के धर्म का प्रचार-प्रसार एवं मार्ग में आने वाले और विजीत प्रदेशों मे लूटमार करना था । अजयराज जी ने उम्र के आखिरी पड़ाव मे राज-काज छोड़कर प्रभुभक्ति की तरफ अग्रसर हुए । उस जमाने में राजपूत जब इस उम्र में घर त्याग करते तो अपना घोड़ा व तलवार साथ रखते थे और सफेद वस्त्र धारण कर एकांत वास को चले जाते थे । अजयराज जी, राज्य भोग से दूर अजमेर की पहाड़ियों में चले गये । उस समय मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा उस क्षेत्र में गायों को चरवाहो से जबरदस्ती ले जाने कि घटना घटित हुई । जब अजयराज जी को यह बात ज्ञात हुई तो उसी समय उनके वृद्ध शरीर में फिर से फुर्ती आ गयी और वह अपनी तलवार और घोड़ा लेकर गाय की रक्षा के लिए निकल पङे । फिर वृद्ध अजयराज जी अकेले ही एक मुस्लिम सेना की टुकङी से टकरा जाते है और इतना भीषण संग्राम होता है, जिसकी कल्पना भी नही की जा सकती है और इसी भीषण संग्राम मे वह वीर-गति को प्राप्त होते है । सबसे रोचक घटना यह यह है कि युद्ध करते समय अजयराज जी चौहान का सर अजमेर की पहाड़ियों में कट जाता है और फिर सर कट जाने के बाद भी अजयराज जी चौहान का धङ रण जारी रखता है,
उनका धङ आक्रमणकारियों को गुजरात के अंजार जिले तक खदेड़ता है। गुजरात के अंजार जिले मे उनका धङ गिरा और वहाँ उनकी समाधी व छतरी बनी हुई है और वह पूजे भी जाते है । अजमेर के पास जहाँ सिर गिरा था वहां भी उनकी समाधी व छतरी बनी हुई है,और यहाँ भी उनकी पुजा होती है । अजमेर से अंजार गुजरात कोई 600 किलोमीटर कि दूरी पर है, और इतना दूर बिना सिर युद्ध करते हुये जाना किसी क्षत्रिय राजपूत के ही वश बात हो सकती है ।
सिर कटियो धड़ लड़ियों, जंग में जोश सवार ।
बिन माथे सेना लारै दौड़ियो, खम्मा खम्मा राजपूती सिरदार ।।
Post a Comment
0 Comments