राव मालदेव का संपूर्ण इतिहास


राव मालदेव मारवाड़ के महाराजाधिराज राव गांगा के  ज्येष्ठ पुत्र थे । इनका जन्म वि॰सं॰ 1568 पोष बदि 1 को (ई.स. 1511 दिसम्बर 5) हुआ था।अपने पिता के समय में ही राव मालदेव ने अनेक युद्धों में भाग लिया था और अपने युद्धकौशल का प्रदर्शन किया था । राव गांगा की मृत्यु के बाद 5 जून, 1531 को मालदेव मारवाड़ की गद्दी पर बैठे । राव मालदेव एक महत्वाकांक्षी और पराक्रमी राजपूत योद्धा थे ‌‌। राव मालदेव के पास एक शक्तिशाली सेना भी थी । राव मालदेव जब गद्दी पर बैठे थे, तब उनके अधिकार में केवल जोधपुर और सोजत के ही परगने थे, तब राव मालदेव ने गद्दी पर बैठते ही मारवाड़ की सीमाओं का विस्तार किया और अपने आस-पास तथा अनेक प्रदेशों को जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित किया और इस प्रकार इस वीर राजपूत योद्धा ने मारवाड़ राज्य और राठौड़ वंश का गौरव चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया । जैतारण, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, खेड़, महेवा, सिवाणा, मेड़ता आदि के सरदार आवश्कतानुसार जोधपुर नरेश को केवल सैनिक सहायता दिया करते थे। परन्तु अन्य सब प्रकार से वे अपने-अपने अधिकृत प्रदेशों के स्वतन्त्र शासक थे। राव मालदेव अपने युग का महान् योद्धा, महान् विजेता और विशाल साम्राज्य का स्वामी था। उसने अपने बाहुबल से एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। मालदेव ने सिवाणा जैतमालोत राठौड़ों से, चौहटन, पारकर और खाबड़ परमारों से, रायपुर और भाद्राजूण सीधलों से, जालौर बिहारी पठानों से, मालानी महेचों से, मेड़ता वीरमदेव से, नागौर, सॉभर, डीडवाना मुसलमानों से, अजमेर साँचोर चौहाणों से छीन कर जोधपुर-मारवाड़ राज्य में मिलाया। इस प्रकार राव मालदेव ने वि॰सं॰ 1600 तक अपने साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार कर लिया। उत्तर में बीकानेर व हिसार, पूर्व में बयाना व धौलपुर तक एवं दक्षिण-पश्चिम में राघनपुर व खाबड़ तक उसकी राज्य सीमा पहुँच गई थी। पश्चिम में भाटियों के प्रदेश (जैसलमेर) को उसकी सीमाएँ छू रही थी। इतना विशाल साम्राज्य न तो राव मालदेव से पूर्व और न ही उसके बाद ही किसी राजपूत शासक ने स्थापित किया। सर्वप्रथम राव मालदेव ने 1539 ई. में भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया और भाद्राजूण पर अधिकार कर लिया । भाद्राजूण का शासक वीरा युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया । इसके पश्चात राव मालदेव ने रायपुर पर आक्रमण किया और रायपुर का शासक भी मारा गया और रायपुर पर भी मालदेव का अधिकार हो गया ।रायपुर के बाद राव मालदेव ने नागौर पर आक्रमण कर दिया, क्योंकि नागौर उस समय एक मुस्लिम राज्य था और उस समय नागौर पर दौलत ख़ां का अधिकार था । राव मालदेव ने दौलत ख़ां को हराकर नागौर पर भी अधिकार कर लिया । नागौर पर अधिकार के बाद राव मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया, मेड़ता का मालदेव के समय शासक वीरमदेव था । राव गांगा के समय में ही एक हाथी को लेकर मालदेव और वीरमदेव के बीच वैमनस्य उत्पन्न हो गया था । वीरमदेव ने अजमेर पर अधिकार करके मालदेव की क्रोधाग्नि को भड़का दिया । अतः मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना आधिपत्य जमा लिया और वीरमदेव को हरा दिया और वीरमदेव अजमेर की ओर भाग गया । राव मालदेव, वीरमदेव की शक्ति को नष्ट करने के लिए कटिबद्ध थे ‌। अतः 1538 ई. में मालदेव ने वीरमदेव को अजमेर से भी खदेड़ देने के लिए एक विशाल सेना भेजी । मालदेव की सेना ने वीरमदेव को अजमेर से भगा दिया और मालदेव ने अजमेर पर भी अधिकार कर लिया । वीरमदेव इधर-उधर भटकने के बाद शेरशाह सूरी के पास चला गया । इसके बाद राव मालदेव ने सिवाना पर आक्रमण कर दिया । मालदेव के समय सिवाना का शासक डूंगरसिंह था । नागौर के युद्ध के दौरान मालदेव ने डूंगरसिंह को अपनी सहायता के लिए बुलाया था परंतु डूंगरसिंह ने मालदेव के अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया । अतः 1538 ई. में मालदेव ने सिवाना को जीतने के लिए एक सेना भेजी परंतु उसे सफलता नहीं मिली । अतः मालदेव ने स्वयं एक सेना लेकर सिवाना के दुर्ग का घेरा डाल दिया । डूंगरसिंह खाद्य - सामग्री के अभाव में दुर्ग छोड़ कर भाग निकला और सिवाना पर मालदेव का अधिकार हो गया । सिवाना पर विजयश्री प्राप्त कर राव मालदेव ने जालौर पर अधिकार करने के लिए आक्रमण कर दिया, जालौर का शासक उस समय सिकंदर खां था । वैसे तो मालदेव ने बिलोचियों के विरुद्ध सिकंदर खां की सहायता की थी परन्तु सिकंदर खां ने मालदेव कि हत्या करने का षड्यंत्र रचा परंतु सिकंदर खां इस षड्यंत्र में असफल हो गया और मालदेव ने जालौर पर आक्रमण करने के लिए एक विशाल सेना भेज दी । 1540 ई. में मालदेव की सेना ने जालौर पर भी अधिकार कर लिया । जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री उमादे का विवाह 1536 ई. में जोधपुर के राव मालदेव के साथ हुआ, विवाह के उपरांत राव मालदेव व उमादे में अनबन हो जाने के कारण राजस्थान के इतिहास में रानी उमादे को रूठी रानी के नाम से जाना जाता है, रानी ने अपना सम्पूर्ण समय तारागढ़ दुर्ग में व्यतीत कर दिया | महाराणा उदयसिंह से मालदेव का वैमनस्य - शुरुआत में तो मारवाड़ और मेवाड़ के संबंध अच्छे थे । लेकिन बाद में दोनों पक्षों में अनबन हो गई । मेवाड़ के सामंत झाला सज्जा का पुत्र जैतसिंह उदयपुर की जागीर को छोड़कर मालदेव के पास चला गया ‌। मालदेव ने उसे खैखा की जागीर प्रदान की । जैतसिंह ने अपनी पुत्री स्वरूपदेवी का विवाह मालदेव के साथ कर दिया ‌। कुछ समय बाद मालदेव ने स्वरूपदेवी की छोटी बहन से भी विवाह करने का प्रस्ताव जैतसिंह के सामने रखा, परंतु जैतसिंह ने उसे स्वीकार नहीं किया और अपनी पुत्री का विवाह महाराणा उदयसिंह से कर दिया । मालदेव ने इसे अपना अपमान समझा और इसका बदला लेने के लिए कुंभलगढ़ पर आक्रमण कर दिया परन्तु मालदेव को यहां हार का मुंह देखना पड़ा और इस घटना से मारवाड़ और मेवाड़ के बीच शत्रुता बढ़ गई । जालौर पर विजय प्राप्त करने के पश्चात 1542 ई. में मालदेव ने बीकानेर पर अधिकार करने के लिए कूंपा राठौड़ के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी ‌। बीकानेर के शासक जैतसिंह ने मालदेव की सेना का वीरतापूर्वक मुकाबला किया परन्तु उसे पराजय का सामना करना पड़ा और वह लड़ता हुआ युद्ध में मारा गया । शीघ्र ही मालदेव की सेना ने बीकानेर पर अधिकार कर लिया । फिर मालदेव ने बीकानेर का शासन कूंपा राठौड़ को सौंप दिया । जब बीकानेर पर मालदेव का अधिकार हो गया तब राव जैतसी का पुत्र कल्याणमल और भीम भी दिल्ली शेरशाह के पास चले गए। राव वीरमदेव और भीम दोनों मिलकर शेरशाह को मालदेव के विरुद्ध भड़काने लगे। चौसा के युद्ध में हुमायूँ शेरशाह से परास्त हो गया था, तब वह मारवाड़ में भी कुछ समय रहा था। वीरमदेव और राव कल्याणमल अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त करने की आशा से शेरशाह से सहायता प्राप्त करने का अनुरोध करने लगे। इस प्रकार अपने स्वजातीय बन्धुओं के राज्य छीन कर राव मालदेव ने अपने पतन के बीज बोये। वीरम व कल्याणमल के उकसाने पर शेरशाह सूरी अपनी 80000 सैनिकों की एक विशाल सेना के साथ मालदेव पर आक्रमण केरने चला (1543 ई.)। मालदेव महान् विजेता था परन्तु उसमें कूटनीतिक छल-बल और ऐतिहासिक दूर दृष्टि का अभाव था। शेरशाह में कूटनीतिक छल-बल और सामरिक कौशल अधिक था। दोनों सेनाओं ने सुमेल-गिरी (पाली) में आमने-सामने पड़ाव डाला। राव मालदेव भी अपनी विशाल सेना के साथ था। राजपूतों के शौर्य की गाथाओं से और अपने सम्मुख मालदेव का विशाल सैन्य समूह देखकर शेरशाह ने भयभीत होकर लौटने का निश्चय किया। रोजाना दोनों सेनाओं में छुट-पुट लड़ाई होती, जिसमें शत्रुओं का नुकसान अधिक होता। इसी समय मेड़ता के वीरमदेव और शेरशाह ने मिलकर छलकपट की नीति अपनाई। मालदेव के सरदारों में फिरोज शाही मोहरें भिजवाई और नई ढालों के अन्दर शेरशाह के फरमानों को सिलवा दिया था। उनमें लिखा था कि सरदार राव मालदेव को बन्दी बनाकर शेरशाह को सौंपे देंगे। ये जाली पत्र चालाकी से राव मालदेव के पास पहुँचा दिए थे। इससे राव मालदेव को अपने सरदारों पर सन्देह हो गया। यद्यपि सरदारों ने हर तरह से अपने स्वामी की शंका का समाधान दूर करने की चेष्टा की, तथापि उनका सन्देह निवृत्त न हो सका और वह रात्रि में युद्ध शिविर से वापस लौट गया। मारवाड़ की सेना बिखर गई। ऐसी स्थिति में मगरे के नरा चौहान अपने नेतृत्व में 3000 राजपूत सैनिको को लेकर युद्ध के लिए आगे आये। यह देख जैता, कूम्पा आदि सरदारों ने पीछे हटने से इन्कार कर दिया और रात्रि में अपने 8000 सवारों के साथ समर के लिए प्रयाण किया। सुबह जल्दी ही शेरशाह की सेना पर अचानक धावा बोल दिया। जैता व कूपां के नेतृत्व में 8000 राजपूत सैनिक अपने देश और मान की रक्षा के लिए सम्मुख रण से जूझकर कर मर मिटे। इस युद्ध में राठौड़ जैता, कूम्पा पंचायण करमसोत, सोनगरा अखैराज, नरा चौहान आदि मारवाड़ के प्रमुख वीर काम आऐ युद्ध में विजय शेरशाह की हुई। जब यह संवाद शेरशाह को मिला तो उसने कहा “खुदा का शुक्र है कि किसी तरह फतह हासिल हो गई, वरना मैंने एक मुट्टी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत ही खो दी होती।’ यह रक्तरंजित युद्ध वि॰सं॰1600 पोष सुद 11 (ई.स. 1544 जनवरी 5) को समाप्त हुआ। शेरशाह का जोधपुर पर शासन हो गया। राव मालदेव पीपलोद (सिवाणा) के पहाड़ों में चला गया। शेरशाह सूरी की मृत्यु हो जाने के कारण राव मालदेव ने वि॰सं॰ 1603 (ई.स. 1546) में जोधपुर पर दुबारा अधिकार कर लिया। धीरे-धीरे पुनः मारवाड़ के क्षेत्रों को दुबारा जीत लिया गया। मालदेव ने राव जयमल से दुबारा मेडता छीन लिया था। वि॰सं॰ 1619 कार्तिक सुदि 12 (ई.स. 1562 नवम्बर 7) को जैतारण के युद्ध मे राव मालदेव का स्वर्गवास हुआ। इन्होंने अपने राज्यकाल में कुल 52 युद्ध किए। एक समय इनका छोटे बड़े 58 परगनों पर अधिकार रहा। राव मालदेव एक वीर योद्धा, कुशल सेनापति तथा महान विजेता के साथ-साथ एक महान निर्माता भी था । राव मालदेव ने अनेक जलाशयों, दुर्गों आदि का निर्माण करवाया । मालदेव ने रियां, दुनाड़े, पीपाड़ आदि कई ठिकानों के चारों ओर कोट बनवाकर उन्हें सुदृढ़ बनवाया । साथ ही सिवाणा, अजमेर, बीकानेर आदि के दुर्गों का जीर्णोद्धार करवाया । राव मालदेव ने समस्त सत्ता को अपने हाथों में केंद्रित रखा और अपने आपको 'महाराजा', 'महाराजाधिराज', व 'महाराय' की उपाधियों से अलंकृत किया ।

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