Brave Rajput
उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत (कच्छावा) - सर कटने के बाद भी युद्ध लड़ने वाला राजपूत योद्धा
उम्मेदसिंह और दलसिंह जी कुम्भावत
यह बात माउंडा और मंढोली के युद्ध के समय की है। माऊंडा-मंडोली (तंवरावाटी) का युद्ध भरतपुर के जाट राजा जवाहर सिंह और जयपुर के सूर्यवंशी क्षत्रिय कछवाहा राजा सवाई माधो सिंह प्रथम के बीच सन् 1767 में 14 दिसंबर को लड़ा गया, जिसमे भरतपुर की फ़ौज और जवाहर सिंह को मुंह की खानी पड़ी और रण छोड़ कर भागना पड़ा। इस युद्ध में कई कुम्भावत कच्छावों ने भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुए। माउंडा और मंढोली का युद्ध जब लड़ा जा रहा था, तब उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का जाटों से युद्ध करते हुए सिर कट गया, लेकिन दोनों कुम्भावत भाई सिर कटने के बाद भी युद्ध मैदान में भयंकर संग्राम करते रहे। उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत ने बिना सिर के सैंकड़ो शत्रुओं को मौत के घाट उतार दिया। उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का बिना सिर के तलवार चलाने का दृश्य बड़ा ही रोमांचित और अद्भुत था। उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत को बिना सिर के युद्ध करते हुए देखकर जाटों के होश उड़ गए और जाट घबरा गये और युद्ध मैदान से भाग खड़े हुए। उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का धड़ जाट की राड़ी में आकर शांत हुआ। इस युद्ध को उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत के बाहुबल के कारण, जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह इस युद्ध को जीत गए। महार गांव में उम्मैदसिंह व दलसिंह कुम्भावत की देवलियां स्थापित है, और उम्मेदसिंह के साथ उनकी पत्नी भी सती हुई थी, उनकी भी देवली वहां स्थापित है। तो इस प्रकार उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का बिना सिर के लड़ने के कारण उन्होंने कुम्भावत कच्छावा कुल की लाज रखी। हमें गर्व है उम्मेदसिंह व दलसिंह जी जैसे वीरों पर, जिन्होंने राजपूत कुल में जन्म लिया और समस्त राजपूतों को गौरवान्वित किया।
गीत(छावली) उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का
कुंभा सम रंग दे रिया, कवि, गायक बतेर।
दलजी और उम्मेदसिंह, समर मांवडै सेर।।
कुंभा सम रण राच्चिया, दोऊ कुंभावत वाह।
साख भरै रणौई मझ, अंजै चूतरो आह।।
ऊदावत उम्मेद दल, वीरगति लिय रंग।
गढ़ महार अंजसै अबहुं, मालेसर शिव संग।।
डहर मंढोली मांवडै, जुट्ट जट्ट सूं जंग।
बिन मस्तक रण जूझिया, रंग कुम्भावत रंग।।
सुरपुर कुंभो हरखेवे, महार महोच्छव होय।
मालेश्वर ताण्डव रचै, रंग उम्मैद-दल तोय।।
रावत राजी होरिया, सुर सभा बिज सज्ज।
दल-उम्मेद रण राखली, कुंभावत कुल लज्ज।।
सिर कटिया धड़ मच्चिया, नच्चिया शिव तत्काल।
मुण्ड माल माणक मिल्या, रंग ऊदावत लाल।।
जोड़ायत काटां चढ़ी, सुणर जंग जूंझार।
नयन करै नाराण-सम, नगर म्हार नर नार।।
✍️ @kartabbanka_rifles (दैवेन्द्र सिंह गौड़)✍️


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