Mewar History
राणा सांगा - एक महान योद्धा
राणा सांगा (संग्राम सिंह), मेवाड़ के सिसोदिया वंश के सबसे प्रतापी राजा माने जाते हैं, इन्होंने अपने शासनकाल में मेवाड़, अपने कुल सिसोदिया वंश तथा सम्पूर्ण भारत का गौरव चरम सीमा पर पहुंचा दिया था । राणा सांगा (संग्राम सिंह) का पूरा जीवन युद्धों में बीता था, इस वजह से इनकी एक आंख नहीं थी, एक हाथ नही था, तथा एक पैर नही था और साथ ही युद्धों में लड़ने के कारण छोटे-बड़े शरीर पर 80 घाव थे । इसके बावजूद भी इन्होंने कभी हार नहीं मानी और कई सारे युद्ध लड़े । ज़रा सोचिए कैसा दृश्य रहा होगा, जब वो शूरवीर अपने शरीर पर 80 घाव होने के बावजूद, एक आँख, एक हाथ और एक पैर पूर्णतः क्षतिग्रस्त होने के बावजूद जब वो लड़ने जाता था । राणा सांगा (संग्राम सिंह) का जन्म 12 अप्रैल 1484 ई. को हुआ था । राणा सांगा, राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे । राणा रायमल के दो बेटे और थे, पृथ्वीराज और जयमल । राणा रायमल के जीवनकाल में ही मेवाड़ की गद्दी को लेकर पृथ्वीराज, जयमल तथा राणा सांगा में मनमुटाव उत्पन्न हो गया था। परंतु राणा सांगा ने इस समय धैर्य, साहस तथा कूटनीति से काम लिया और अपनी सैनिक शक्ति संगठित करते रहे । धीरे धीरे राणा सांगा के पक्ष में ही परिस्थितियां होती चली गई । पृथ्वीराज की विष की गोलियां खाने से मृत्यु हो गई तथा जयमल भी सोलंकियों से युद्ध करते हुए मारे गए । अतः 1509 में अपने पिता रायमल की मृत्यु के बाद कर्मचंद पंवार की सहायता से राणा सांगा मेवाड़ की गद्दी पर बैठे । इनका शासनकाल 1509 से 1527 तक रहा । राणा सांगा एक पराक्रमी तथा महत्त्वकांक्षी राजा थे । अपनी शूरवीरता तथा पराक्रमपूर्ण कार्यों के कारण राणा सांगा ने भारत के इतिहास में अपना गौरवपूर्ण स्थान बना लिया है । साथ ही इन्होंने दिल्ली, गुजरात, व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी से ऱक्षा की। इतिहास में वर्णित है कि महाराणा संग्राम सिंह की तलवार का वजन 20 किलो था । राणा सांगा ने सर्वप्रथम गद्दी पर बैठते ही अजमेर और चाकसू पर अधिकार कर लिया और यह क्षेत्र अपने विश्वासपात्र कर्मचंद पंवार को सौंप दिया । फिर राठौड़ों के ईडर राज्य में सिंहासन के लिए रायमल राठौड़ और भारमल राठौड़ में संघर्ष चल रहा था, तथा रायमल राठौड़ की प्रार्थना पर राणा सांगा ने ईडर पर आक्रमण किया और रायमल को सिंहासन पर बैठा कर वापस मेवाड़ लौट आए । इसके बाद राणा सांगा का मालवा के सुल्तान महमूद द्वितीय के साथ मनमुटाव हो गया था । क्योंकि मेदिनीराय नामक राजपूत सरदार का महमूद द्वितीय पर अत्यधिक प्रभुत्व था । मेदिनीराय की बढ़ती हुई शक्ति से मालवा के सरदार सुल्तान महमूद के कान भरने लगे, जिससे सुल्तान बहकावे में आ गया और जनवरी,1518 में मालवा के सुल्तान महमूद द्वितीय तथा गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह ने मेदिनीराय राजपूत सरदार पर आक्रमण कर दिया, इस पर मेदिनीराय ने राणा सांगा से सहायता मांगी, इस पर राणा सांगा ने मेदिनीराय की सहायता के लिए एक विशाल सेना लेकर मालवा की ओर प्रस्थान किया । राणा सांगा ने मालवा की सेना को खदेड़ कर गागरौन के किले पर अधिकार कर लिया और यह किला मेदिनीराय राजपूत सरदार को सौंप कर, राणा सांगा वापस मेवाड़ लौट आए । गागरौन का प्रदेश हाथ से निकल जाने के कारण मालवा का सुल्तान महमूद द्वितीय बड़ा क्रोधित हुआ और उसने एक विशाल सेना लेकर गागरौन पर आक्रमण कर दिया, इस स्थिति में मेदिनीराय ने राणा सांगा से वापस सहायता मांगी । अतः राणा सांगा ने इस स्थिति में एक शक्तिशाली सेना के साथ गागरौन के लिए प्रस्थान किया, राजपूत और मुसलमानों में घमासान युद्ध हुआ, राजपूतों ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए मालवा की सेना तथा सुल्तान महमूद द्वितीय को हरा दिया और राणा सांगा ने महमूद द्वितीय को बन्दी बना लिया, लेकिन महमूद द्वितीय ने राणा सांगा से क्षमा मांगी और कहा कि आप मुझे छोड़ दे, इस पर राणा सांगा ने सुल्तान को क्षमादान देकर छोड़ दिया, इस अवसर पर सुल्तान महमूद द्वितीय ने अपने एक पुत्र को जामिन के तौर पर चित्तौड़ छोड़ा और राणा सांगा को बहुमूल्य रत्नजड़ित सोने की कमरपेटी भेंट की । फिर राणा सांगा को गुजरात के सुल्तान के साथ भी युद्ध करना पड़ा । ईडर पर गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह का अधिकार हो गया था, परंतु राणा सांगा ने ईडर पर आक्रमण कर वहां के मुस्लिम अधिकारी को भगा दिया तथा ईडर पर अधिकार कर लिया तथा ईडर का राज्य वापस अपने मित्र रायमल राठौड़ को सौंप दिया और राणा सांगा वापस मेवाड़ लौट आए । राणा सांगा के मेवाड़ जाते ही गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह ने अहमदनगर के शासक निजामुलमुल्क को ईडर पर आक्रमण के लिए भेजा, लेकिन रायमल राठौड़ ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए निजामुलमुल्क को हरा दिया । इसके बाद सुल्तान मुजफ्फरशाह ने जहीरूनमुल्क को भेजा लेकिन रायमल राठौड़ ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए इसे भी हरा दिया । अंत में सुल्तान मुजफ्फरशाह ने मलिक हुसैन को ईडर पर अधिकार करने के लिए भेजा, इस बार मलिक हुसैन ने ईडर पर अधिकार कर रायमल राठौड़ को हरा दिया । रायमल राठौड़ की प्रार्थना पर राणा सांगा ने 1520 ई. में एक विशाल सेना लेकर ईडर की ओर प्रस्थान किया और मलिक हुसैन को पराजित करके रायमल राठौड़ को ईडर की गद्दी पर वापस बैठा दिया । राजपूतों ने मुस्लिम राज्य बड़नगर तथा अहमदनगर को खूब लुटा तथा इसके पश्चात राणा सांगा की सेना वापस चित्तौड़ लौट आई । राणा सांगा के हाथों से अपनी पराजय से सुल्तान बड़ा क्रोधित हुआ, अतः उसने अपनी पराजय का बदला लेने के लिए सोरठ के हाकिम मलिक अयाज को मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजा, मुस्लिम सैनिकों ने मार्ग में डूंगरपुर, बांसवाड़ा और सागवाड़ा को नष्ट करती हुई मंदसौर तक पहुंच गई । इस सेना के साथ मालवा का सुल्तान महमूद द्वितीय भी आ मिला । लेकिन इन सब के बावजूद भी राणा सांगा की सेना बहुत बड़ी थी, मलिक अयाज ने युद्ध में राणा सांगा से पराजित होने की आंशका से राणा सांगा से संधि कर ली । जिससे मालवा के सुल्तान को भी लौटने के लिए विवश होना पड़ा । इस कारण गुजरात और मालवा मिलकर भी मेवाड़ तथा राणा सांगा का कुछ नहीं बिगाड़ सके और राणा सांगा अपने राज्य मेवाड़ की रक्षा करने में सफल रहे । इसके बाद सिकन्दर लोदी के शासनकाल के अंतिम दिनों में राणा सांगा ने दिल्ली सल्तनत के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था । इसके अतिरिक्त जब सुल्तान सिकन्दर लोदी अपने भाई जलाल खां के विद्रोह का दमन करने में व्यस्त था, तब उस समय राणा सांगा ने मौके का फायदा उठाते हुए दिल्ली सल्तनत के कुछ प्रदेशों पर भी अधिकार कर लिया था । इस पर इब्राहिम लोदी ने राणा सांगा पर आक्रमण कर दिया । 1517 ई. में बूंदी राज्य की सीमा पर स्थित खातौली नामक स्थान पर दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ, जिसमें राणा सांगा ने इब्राहिम लोदी को हराकर विजयश्री प्राप्त की । इस विजय के बाद राणा सांगा समस्त उत्तर भारत में सर्वशक्तिशाली हो गये । अपने छोटे से राज्य मेवाड़ को विस्तीर्ण कर वे अपने गौरव के चरमोत्कर्ष पर पहुंच गए थे । फिर 1526 ई. में बाबर ने पानीपत की प्रथम लड़ाई में दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित करके दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया । दिल्ली और आगरा को अधीन करने के बाद बाबर संपूर्ण उत्तरी भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहते थे । उत्तरी भारत का स्वामी बनने के लिए बाबर को राणा सांगा को हराना आवश्यक था । अतः बाबर ने राणा सांगा से युद्ध करने का निश्चय कर लिया ।पहले बाबर ने राणा सांगा के कालपी, धौलपुर और बयाना प्रदेश पर अधिकार कर लिया इससे क्रुद्ध होकर राणा सांगा ने बाबर की सेना पर आक्रमण करके कालपी, धौलपुर और बयाना को वापस राणा सांगा ने जीत लिया । साथ ही जब बाबर पानीपत का युद्ध लड़ रहा था तब राणा सांगा ने मौके का फायदा उठाते हुए, राणा सांगा ने ऐसे कुछ प्रदेशों पर अधिकार कर लिया, जो दिल्ली सल्तनत के अधीन थे । राणा सांगा ने रणथम्भौर के निकट खण्डार क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया था, इन क्षेत्रों पर अधिकार करने के बाद राणा सांगा ने बाबर को क्रूद्ध कर दिया और बाबर ने राणा सांगा से युद्ध करने का निश्चय कर लिया, और युद्ध के लिए राणा सांगा को आमंत्रण दिया तथा राणा सांगा को खानवा के मैदान में युद्ध करने के लिए बुलाया । वहीं राणा सांगा बाबर को विदेशी मुगल म्लेच्छ समझते थे, तथा बाबर और मुगलों को राणा सांगा हिंदुस्तान से बाहर खदेड़ना चाहते थे । लेकिन राणा सांगा की सेना के सामने बाबर की सेना बड़ी थी, इस वजह से यहां इन्होंने कूटनीति से काम लेते हुए सारे राजपूतों को एक कर दिया तथा सभी राजपूतों ने अपनी थोड़ी-थोड़ी सेना बाबर से युद्ध लड़ने के लिए राणा सांगा के पक्ष में भेजी । साथ ही अफगान भी बाबर के प्रतिद्वंद्वी थे, इसलिए राणा सांगा ने अफगानों को अपने पक्ष में कर लिया । इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी अपनी सेना लेकर राणा की शरण में आ गया तथा हसनखां मेवाती भी अपने योद्धाओं के साथ राणा सांगा के साथ शामिल हो गया । बाबर राजपूत-अफगान संगठन अपने लिए ख़तरनाक मानता था, इस वजह से बाबर ने राजपूतों की शक्ति को नष्ट करने का निश्चय कर लिया ।
मार्च, 1527 में बाबर ने खानवा के मैदान में पहुंच कर अपनी सेना की व्यूह-रचना की । यहां खाइयां खोदी गई, तोपों की गाड़ियों को जंजीरों से बांध कर आगे रखा गया तथा गोलंदाजों, घुड़सवारों तथा बंदूकचियों को मैदान में जमाया गया । बाबर की सेना 60000(साठ हजार) तथा राणा सांगा की सेना 100000 (एक लाख) थी । राणा सांगा अपनी सेना के साथ 13, मार्च को खानवां पहुंच गए । 17 मार्च 1527 को सुबह साढ़े नौ बजे खानवा के मैदान में दोनों पक्षों में घमासान युद्ध शुरू हुआ । राजपूतों ने मुगलों पर भयंकर प्रहार किये, लेकिन बाबर के तोपखाने के आगे राजपूत वीर ज्यादा समय तक नहीं टिक पाये, राजपूतों को बाबर के तोपखाने से निकलती हुई अग्निवर्षा को सहन नहीं कर सके, और राजपूतों को नतमस्तक होना पड़ा, फिर भी राजपूत अंत तक युद्ध में डटे रहे । राजपूतों को उस समय तोपों, तथा बंदूकों के बारे में जानकारी थी नहीं, राजपूतों को उस समय केवल पुरानी युद्धपद्धति से लड़ना आता था, इस वजह से राजपूतों को बाबर के सामने नतमस्तक होना पड़ा । फिर स्वयं राणा सांगा युद्ध लड़ते हुए एक तीर की चोट से बेहोश हो गए, और उन्हें घायल अवस्था में युद्ध मैदान से बाहर ले जाया गया और फिर सेना का नेतृत्व झाला अज्जा सरदार ने किया, परंतु वह भी युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । हजारों राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए और मुगलों की विजय हुई । मुगलों की विजय इस वजह से हुई क्योंकि उनके पास तोपखाना था, बंदूके थी, तथा उनके पास युद्ध शैली पद्धति नई थी, जबकि राजपूत तोपखाना, बंदूकों आदि से अनभिज्ञ थे, तथा राजपूतों की लड़ने की शैली पद्धति पुरानी थी । युद्ध जीतने की बाद बाबर ने मेवाड़ी सेना तथा राजपुतों के कटे सरो की मीनार बनवाई थी । जब राणा को होश आने के बाद यह बात पता चली तो वो बहुत क्रोधित हुए उन्होंने कहा मैं हारकर चित्तोड़ वापस नही जाऊंगा उन्होंने अपनी बची-कुची सेना को एकत्रित किया और फिर से आक्रमण करने की योजना बनाने लगे इसी बीच उनके किसी विश्वास पात्र ने उनके भोजन में विष मिला दिया ,जिससे उनकी मृत्यु हो गई । तो यह थे शूरवीर योद्धा राणा सांगा जिन्होंने अपने शरीर पर 80 घाव होने के बावजूद, एक आंख, एक हाथ, और एक पैर नही होने के बाद भी अपने जीवनकाल में एक भी युद्ध नहीं हारा । राणा सांगा ने सिर्फ बाबर के खिलाफ लडा गया खानवा का युद्ध हारा था, वो भी इस वजह से की उन्हें तोपों तथा बंदूकों के बारे में उस समय जानकारी नहीं थी । फिर भी इन्होंने अपने अंतिम समय तक सिसोदिया वंश और मेवाड़ का मान घटने नहीं दिया और आजीवन संघर्ष करते रहे, और इनकी मृत्यु के बाद इनकी राणियां इनके साथ सती हो गई ।एक विश्वासघाती के कारण वह बाबर से युद्ध हारे लेकिन उन्होंने अपने शौर्य से दूसरों को प्रेरित किया। इनके शासनकाल में मेवाड़ अपनी समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह इन्होंने अपने राज्य की रक्षा तथा उन्नति की। राणा सांगा अदम्य तथा साहसी योद्धा थे। एक भुजा, एक आँख खोने व अनगिनत ज़ख्मों के बावजूद उन्होंने अपना महान पराक्रम नहीं खोया, मालवा के सुलतान मोहम्मद द्वितीय को युद्ध में हराने व बन्दी बनाने के बाद उन्हें उनका राज्य पुनः उदारता के साथ सौंप दिया, यह उनकी बहादुरी को दर्शाता है।
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