रावल दूदाजी (दुर्जनशाल) भाटी और जैसलमेर का दूसरा साका और जौहर

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जैसलमेर का दूसरा साका और जौहर


जैसा की हमने आपको हमारी पिछली पोस्ट में बताया ही था कि जैसलमेर के पहले साके और जौहर के बाद रावल दूदाजी (दुर्जनशाल) भाटी को भगवान शिव, कुलदेवी मां स्वांगिया और भाटियों के कुलदेवता श्रीकृष्णा के आशीर्वाद और अनुकम्पा से जैसलमेर की राजगद्दी प्राप्त हो गई थी। राजगद्दी प्राप्त हो जाने के पश्चात रावल दूदाजी भाटी और उनके भाई तिलोकसी ने कई दिनों तक सत्ता व शासन को आनन्दपूर्वक भोगा। लेकिन काफी समय बीत जाने के पश्चात रावल दूदाजी (दुर्जनशाल) भाटी को "जसोड़ भाटी भाइयों द्वारा शाका करने के प्रण की याद आई"। जैसलमेर के पहले साके के समय दूदाजी भाटी और तिलोकसी भाटी और उनके जसोड़ भाटी भाइयों ने जैसलमेर के किले को त्यागकर अमरकोट चले गए थे, परंतु किले को त्यागने से पहले उन्होंने प्रण लिया था कि हम जसोड़ भाटी भाई अलग से अपना शाका रचायेंगे। रावल दूदाजी (दुर्जनशाल) भाटी ने इस प्रण की याद अपने भाई तिलोकसी भाटी को दिलाई और उलहाना देते हुए कहा कि इस दिशा में उन्होंने अभी तक कुछ नहीं किया है। 


अपने सफेद हो रहे बालों को रोजाना दर्पण में देखकर रावल दूदाजी (दुर्जनशाल) भाटी चिन्ता किया करते थे कि कहीं समय यों ही ना बीत जाएं और शाका करने का उनका प्रण बीच में धरा का धरा न रह जाए। जसोड़ भाटी भाइयों की समस्या व धर्मसंकट यह था कि शाका करें तो कैसे करें? पहले कोई शक्तिशाली शत्रु जैसलमेर पर आक्रमण करने का दुस्साहस तो करें, राज्य में लूटमार करके उसे वीरान कर दे, फिर कई वर्षों तक किले को घेरे रहे और अन्त में भुख प्यास से थके-मांदे भाटी शाका करें। उन्हें इस प्रण को पूरा करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ही एक सुयोग्य विरोधी दिखाई दे रहा था। किंतु अलाउद्दीन खिलजी एक चतुर और चालाक शासक था वह भाटियों द्वारा शाका करने की योजना के जाल में आसानी से फंसने वाला नहीं था। इसलिए सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के स्वयं के खालसा क्षेत्र में तिलोकसी भाटी ने लूट-खसोट और मार-काट का सिलसिला आरम्भ कर दिया, ताकि अलाउद्दीन खिलजी क्रोधित होकर जैसलमेर पर आक्रमण करें और जसोड़ भाटी भाई अपने शाके का प्रण पूरा करें।


एक दिन ख्वाजा निजामुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी अजमेर आया हुआ था, तब उसी दिन संध्या के समय अलाउद्दीन के शाही अस्तबल के घोड़े-घोड़ियों को पानी पिलाने और नहलाने के लिए अनासागर झील पर सुल्तान के सैनिक गए हुए थे। तभी अचानक तिलोकसी भाटी ने घोड़े-घोड़ियों के झुण्ड पर आक्रमण करके, अरबी नस्ल की एक सौ चालीस घोड़ियां छांटकर और उन घोड़ियों को साथ लेकर जैसलमेर रवाना हो गए। घोड़ियां लेकर रवाना होते हुए, तिलोकसी ने शाही सेवकों व सुल्तान के सैनिकों से कहा कि सुल्तान से कहना कि अगर घोड़ियां छुड़वानी हो तो वह जैसलमेर आ जाए।

दोहा - "तब एकण नर अपीया पीरोसाह हजूर।
घोड़े लिए तिलोकसी है भाटी नर नूर।।"

तिलोकसी द्वारा किए गए इस अद्भुत साहसिक कार्य से सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी क्रोधित हो गया, वह मन ही मन में भाटियों के साहस की सराहना करते हुए आश्चर्यचकित थे। सुल्तान ने तुरंत ही नवाब कमालुद्दीन गुर्ग को जैसलमेर भेजकर घोड़ियां मुक्त कराने के आदेश दिए और भाटियों को दंड देकर उन्हें सबक सिखाने के लिए कहा।


सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने निश्चय किया कि पहले की भांति ही भाटियों को उनकी मांद में ही दण्डित किया जाये। भाटियों ने इस निर्णय का हार्दिक स्वागत किया। क्योंकि भाटियों ने तो शाका करने का पहले से ही निश्चय कर रखा था, वह तो लम्बे समय से इस अवसर की तलाश एवं तैयारी कर रहे थे। विक्रम संवत् 1365 में नवाब कमालुद्दीन गुर्ग और मलिक काफूर के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना जैसलमेर आई, परन्तु शाही सेना के वहां पहुंचकर शिविर लगाने से पहले ही भाटियों ने प्रर्याप्त मात्रा में खाद्य-सामग्री व अन्य साज-सामान का भण्डारण कर किले के द्वार बन्द कर लिए। शाही सेना ने जैसलमेर का घेरा डाल दिया। यह अन्तहीन घेराबंदी छः सालों तक चलती रही। इस लम्बी घेराबंदी से शाही सैनिक थक गये और अपने परिवारों से दूर रहने के कारण सैनिक चिड़चिड़े भी रहने लगे और दूसरी तरफ किले के अंदर साज-सामान का अभाव व निरंतर घटते खाद्यान्नों के भण्डार के कारण भूखों मरने की स्थिति ने जसोड़ भाटी भाइयों को बाध्य किया कि, खाद्य-सामग्री खत्म होने से पहले ही वह शाका कर लें।

इसलिए उन्होंने छह सालों से प्रतीक्षित शाका और जौहर करने का निश्चय कर लिया, भाटियों ने हार मानकर किले का समर्पण करने का प्रश्न ही समाप्त कर दिया। 


रावल दूदाजी (दुर्जनशाल) भाटी ने अपने कुलगुरू से शाका और जौहर करने की श्रेष्ठ तिथि निकलवाई। रावल दूदा ने शाका करने का समय जानकर अपनी रानी सोढ़ी को जौहर करने की तिथि बताई। रानी ने स्वर्ग में पहचान करने के लिए रावल से शरीर का चिन्ह मांगा, तब रावल दूदाजी ने अपने पैर का अंगूठा काट कर दे दिया। 

दशमी तिथि के दिन जौहर हुआ।रानियों ने तुलसीदल की माला धारण की तथा त्रिलोचन, त्रिवदन लिए और 1600 हिन्दू क्षत्राणियों के साथ पवित्र जौहर की अग्नि में प्रवेश किया। अगले दिन एकादशी तिथि को रावल ने शाका करने का विचार किया था, इसलिए सभी योद्धा मिल रहे थे। एक राजपूत युवक धाडू जो 15 वर्ष का था, वो जूंझार होने वालों में से एक था। उसने सुना था कि कुंवारे की सदगति नहीं होती है, इसलिए वह दुःखी था। यह जानकर रावल ने अपनी एकमात्र राज कन्या जो नौ वर्ष की थी और कुंवारी कन्या के जौहर में भाग लेने से उसकी पवित्रता दूषित हो जाती है, इसलिए वह अपने पिता रावल दूदाजी के पास आ गई थी। उस राज कन्या का विवाह पन्द्रहवर्षीय धाडू के साथ दशमी तिथि की आधी रात में कर दिया गया, ताकि दोनों जौहर और शाके में भाग ले सकें। 


विक्रम संवत् 1372 को माघ महीने के एकादशी के दिन जैसलमेर दुर्ग के कपाट खोले गए और 25 नियम धर्म से बन्धे (नेमणियात) जूंझारों के साथ, रावल दूदाजी और उनके भाई तिलोकसी और उनके साथ सैंकड़ों हिन्दू राजपूत वीर जिरहबख्तर पहने हुए, शत्रुओं पर टूट पड़े। युद्ध करते समय रावल दूदाजी के भाई तिलोकसी के सम्मुख पांजू नामक मुस्लिम सेनानायक आया, यह अपने शरीर को सिमटा कर तलवार के वार से बचाने में माहिर था। परन्तु वीर तिलोकसी भाटी की तलवार के एक झटके से ही उसके शरीर के नौ टूकड़े हो गए। इस पर रावल दूदाजी ने तिलोकसी की बहुत प्रशंसा की, और कहा कि इस शौर्य पर मेरी नजर लगती हैं। कहते हैं कि तभी तिलोकसी का प्राणान्त हो गया। इस भयंकर युद्ध के अंत में 1700 वीरों के साथ रावल दूदाजी अपने चुने हुए 100 खास अंगरक्षक योद्धाओं के साथ रणखेत (शहीद) रहे।


रावल दूदाजी आसनी गांव में बने हिंगलाज माता मंदिर के पास मारे गए थे, उस स्थान पर ही उनकी छतरी बनी हुई हैं। उनकी दस रानियों ने जौहर किया था। भारत माता की रक्षा में रावल दूदा ने अपना क्षत्रिय धर्म निभाया और हिन्दुत्व के लिए आशा का संचार किया। रावल दूदाजी अपने को सदा ही "सरग रा हेड़ाऊ" अर्थात् स्वर्ग जानें के लिए धर्म रक्षार्थ युद्ध में शहीद रहने को तत्पर रहते थे।

इसके साथ ही जैसलमेर किले के बाहर लड़े गए युद्ध में उत्तैराव जसोड़ भाटी ने अद्भूत वीरता का प्रदर्शन किया। उनका युद्ध करते हुए शीश कट गया परंतु काफी समय तक वह बराबर तलवार चलाते रहे और युद्ध लड़ते रहे। उन पर 'गुली' (नील) के छिंटे डालने पर धड़ शांत होकर धरती मां की गोद में समा गया। जहां उनका शीशरहित धड़ गिरा था, वहां पर उनकी एक मूर्ति की स्थापना की गई। जैसलमेर की दर्जी अब तक इनकी पूजा करते हैं।


नागौर जिले के खींवसर गांव के लाखा मांगलिया की पुत्री रावल दूदाजी की ग्याहरवीं रानी थी, जैसलमेर के शाके के समय वह अपने पीहर गई हुई थी। उनके साथ खींवसर गए हुए हूंफा बारठ को रानी ने रावल दूदाजी का शीश लाने भेजा ताकि वह उसे गोद में रख कर सती हो सके। जैसलमेर पहुंच कर हूंफा बारठ ने नवाब से रावल दूदाजी का शीश मांगा, तब नवाब ने कहा कि रावल का शीश कटे तो काफी दिन हो चुके है, इसलिए वह अगर बोरों में रखे हुए शीशों में से रावल दूदाजी का शीश पहचान सके तो वह ले जा सकते हैं। रावल के बचपन के साथी और निष्ठावान सहयोगी हूंफा चारण ने बोरों में रखे हुए शीशों को एक दोहा सुनाया :-

"सांदू हूंफै शेवियो साहब दुरजन सल्ल।
बिड़दा माथा बोलीयो गीतां दूहा गल्ल।।"

यह दोहा सुनकर बोरों मे रखें अनेक शीशों में से रावल दूदाजी भाटी का शीश ठहाके मारकर जोर से हंस पड़ा, यही रावल का शीश था। नवाब कमालुद्दीन गुर्ग ने रावल दूदाजी का शीश हूंफा बारठ चारण को सौंपते हुए अपने तत्कालीन शत्रु के आगे श्रद्धा से अपना शीश नवाकर आह भरी कि वीरगति प्राप्त हुए एक राजपूत का शीश ही ऐसा  चमत्कार दिखा सकता हैं। वहां पर उपस्थित सैंकड़ों मुस्लिम सैनिक भी इस चमत्कार से हैरान थे।

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