युद्ध मैदान में शत्रुओं के साथ शतरंज खेला करते थे भाटी राजकुमार राणा रतनसी

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युद्ध मैदान में शत्रुओं के साथ शतरंज खेला करते थे भाटी राजकुमार राणा रतनसी

जैसलमेर के रावल जैतसी के छोटे पुत्र व रावल मूलराज के छोटे भाई राणा रतनसी भाटी थे। राणा रतनसी भाटी बड़े ही वीर व निडर राजपूत योद्धा थे। जब सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने भाटियों को दण्डित करने के लिए लखनऊ के नवाब कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में तीस हजार सैनिकों की विशाल सेना देकर जैसलमेर रवाना किया, तब इस सेना ने जैसलमेर पहुंच कर जैसलमेर किले को घेर लिया। जैसे-जैसे घेराबंदी की अवधि बढ़ती गई, वैसे-वैसे घेरा लगाकर बैठे शत्रु सैनिक धूलभरी आंधियों, भीषण गर्मी, व उदास तीव्र सर्दी से हतोत्साहित होकर अपनी नियति से समझौता करके शान्ति शिविरों में रहने लगे। 


उन्हें उनका वहां ठहराव अन्तहीन लगने लगा, हार-जीत की स्थिति थी ही नहीं। शत्रुओं को सभी परिणाम निष्फल होने लगे। जैसलमेर किले के पूरब में गर्मियों में संध्या के समय किले की लम्बी गहराती परछाई में एक पुराने खेजड़ी के पेड़ के नीचे बैठकर नवाब कमालुद्दीन गुर्ग और उनके वरिष्ठ साथी शतरंज खेला करते थे और राणा रतनसी भाटी किले के बुर्जों के ऊपर से इनका खेल देखते थे। राणा रतनसी भाटी स्वयं शतरंज के निपुण खिलाड़ी थे, इसलिए शत्रुओं के साथ खेल खेलने की राणा रतनसी भाटी की प्रबल इच्छा होती थी। आखिर उनकी इच्छा उनकी भौतिक सुरक्षा पर एक दिन हावी हो ही गई। 


एक दिन भेष बदलकर राणा रतनसी भाटी किले से बाहर निकल आए और शतरंज के खिलाड़ियों के पास खड़े रहकर उनकी चालें देखने लगे। कुछ दिनों पश्चात राणा रतनसी से रहा नहीं गया, खेल में अपनी निपुणता दिखाते हुए वह खिलाड़ियों को मोहरों की चालें चलवाने में साथ देने लग गए। पन्द्रह दिनों पश्चात वह पहचान लिए गए। परंतु नवाब कमालुद्दीन गुर्ग ने एक समर्पित शतरंज के खिलाड़ी की तरह उन्हें सुरक्षा का आश्वासन दिया और अब राणा रतनसी भाटी प्रतिदिन किले से बाहर निकल कर उनके साथ कुछ देर शतरंज खेला करते थे। धीरे-धीरे उनकी शत्रुता आपसी मित्रता में बदल गई, लखनऊ के नवाब कमालुद्दीन गुर्ग और राणा रतनसी भाटी दोनों पगड़ी बदलकर धर्मभाई बन गए, इस राजपूती रिवाज से दोनों के बीच एक पवित्र व ईमानदार अटूट भ्रातृबन्धन स्थापित हो गया था, जो दोनों के जीवन पर्यंत ही नहीं बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता था। 


जब जैसलमेर का पहला साका और जौहर हुआ, उससे पहले राणा रतनसी भाटी ने अपने धर्मभाई कमालुद्दीन गुर्ग को अपने पुत्र घड़सी भाटीकान्हड़देव भाटी, और कान्हड़देव का पुत्र उनड़देव, रावल मूलराज का भानजा मंगलदेव देवड़ा एवं छानणदेव भाटी को नवाब कमालुद्दीन गुर्ग को सुरक्षा के लिए सौंप दिया और कमालुद्दीन गुर्ग ने पवित्र कुरान की शपथ लेकर कहा कि मैं इन सभी की सुरक्षा करूंगा और घड़सी भाटी को जैसलमेर का नया रावल बनाने में सहायता करूंगा। कमालुद्दीन गुर्ग ने अपना वचन ईमानदारी से निभाया था। कमालुद्दीन गुर्ग ने रावल घड़सी भाटी की सुरक्षा भी की और उन्हें जैसलमेर का रावल बनाने में सहायता भी की।

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