Rajput history
वीरवर योद्धा युवराज कुम्भा जी, आमेर
वीरवर योद्धा युवराज कुम्भा जी, आमेर
आमेर के राजा चंद्रसेन जी के प्रथम और ज्येष्ठ पुत्र कुम्भा जी हुए। कुम्भा जी की माता का नाम टांकणजी नवलदे था। कुम्भा जी बचपन से ही बड़े वीर और साहसी व्यक्तित्व के थे। कुम्भा जी के वंशज कुम्भावत कच्छावा कहलाते हैं।
आमेर के राजा चंद्रसेन जी के समय में उनके अधीन जागीरदार स्वतंत्र हो गए और समय पर रेख व बछेरे आदि भी राज्य को नहीं दे रहे थे। इस परिस्थिति में चंद्रसेन जी के सामने दो विकल्प थे कि या तो भाइयों से युद्ध करके उनका दमन किया जाए अथवा भाइयों की मनमानी को देखते हुए राज्य को नष्ट होने दिया जाए। दो वर्ष तक चंद्रसेन जी ने जमुवारामगढ़ में एकांतवास करके उन्होंने अपने विकल्प को चुना। उसके बाद उन्होंने पहले नरूकों का और फिर शेखावतों का दमन किया। नरूकों से उनकी पैतृक जागीर मौजमाबाद छीनी तथा शेखावतों से उनकी पैतृक जागीर बरवाड़ा छीनी। नरूजी व राव शेखा से यह समझौता किया गया कि उन्होंने अपने बाहुबल से जो क्षेत्र जीता है, उसके आप स्वतंत्र शासक रहेंगे, और आप दोनों पर कभी विपत्ति आई तो आमेर राज्य आपकी रक्षा करेगा। इसी प्रकार आमेर राज्य पर संकट आने पर शेखावत व नरूका उनका सहयोग करेंगे।
बरवाड़ा छूट जाने के बाद राव शेखा ने अमरसर को अपनी राजधानी बनाया व काफी क्षेत्र पर विजय प्राप्त करके उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। विक्रम संवत् 1545 में घाटवा में गौड़ राजपूतों के साथ राव शेखा का युद्ध हुआ, जिसमें शेखावतों को जन-धन की बड़ी क्षति हुई और राव शेखा के अपने शिविर रलावता में पहुंचने पर मृत्यु हो गई। राव शेखा के बाद उनके सबसे छोटे पुत्र रायमल जी उनके उत्तराधिकारी के रूप में अमरसर की गद्दी पर विराजमान हुए। इसी वर्ष में अर्थात् वि.सं. 1545 में शीत ऋतु में लोदी सुल्तान बहलोल खां के सेनापति हिन्दाल ने अमरसर पर आक्रमण कर दिया। रायमल जी ने आमेर के राजा चंद्रसेन जी को सन्देश भिजवाया कि - सन्धि के अनुसार या तो आप हमारी मदद करें अन्यथा आमेर राज्य का कुछ हिस्सा देकर हमसे समझौता कर लें।
राजा चंद्रसेन ने उत्तर भिजवाया कि आप युद्ध की तैयारी करो, मैं सेना भेज रहा हूं। चंद्रसेन जी ने अपने बड़े पुत्र कुम्भा जी के नेतृत्व में सेना को अमरसर के लिए रवाना किया। आमेर की सेना मार्ग में जा रही थी, उस समय एक गूजर किसान महिला जो खेत में फसलों को पानी दे रही थी, उसने अपने पुत्र से कहा कि ये आमेर का राजा बड़ा बुद्धिहीन है, जिस युद्ध के लिए आमेर के राजा ने सेना भेजी है, उस युद्ध में राजा की विजय तो होगी लेकिन राजपरिवार का कोई भी सदस्य जीवित नहीं बचेगा। यह बात आमेर के एक सैनिक ने सुन ली और यह बात जाकर कुम्भा जी को बताई। कुम्भा जी ने सेना में शामिल अपने छोटे भाई पृथ्वीराज और अपने पुत्र उदयकर्ण को वापस आमेर भेज दिया और अपने भाई पृथ्वीराज से वचन लिया कि अगर मैं युद्ध में मारा जाऊं तो मेरे पुत्र उदयकर्ण को आमेर का आधा राज्य दे देना। सेनापति हिन्दाल पठान के साथ आमेर राज्य और शेखावतों की सम्मिलित सेना का शिखरगढ़ में युद्ध हुआ, जिसमें कुम्भाजी ने अपनी प्रचण्ड वीरता व शौर्य प्रदर्शन किया और सैंकड़ों पठानों को मौत के घाट उतारा और फिर युद्ध करते-करते कुम्भाजी काफी सारे दुश्मनों से घिर गए तब दुश्मनों ने कुम्भाजी पर एक साथ कई वार किए और गहरे घाव कर दिए, जिसके कारण कुम्भाजी वहीं वीरगति को प्राप्त हो गए। इस युद्ध में विजयश्री तो राजपूतों के हाथ लगी थी, लेकिन कई वीर राजपूत योद्धा इस युद्ध में मारे गए। कुम्भा जी के वीरगति प्राप्त करने के बाद वह भोमियाजी हो गए और रायमलजी ने अमरसर के शेखागढ़ में उनकी स्थापना कर कुम्भाजी का मंदिर बनवाया। अमरसर की जनता और आस-पास के गांवों के लोगों में कुम्भाजी के प्रति आज भी काफी श्रद्धा है और वर्तमान समय में भी कुम्भाजी को लोगों द्वारा पूजा जाता है।



Post a Comment
0 Comments