कांधल (कांधलोत) राठौड़ों का संपूर्ण इतिहास

कांधल (कांधलोत) राठौड़ - राव रणमल (जोधपुर) के पुत्र कांधल जी के वंशज कांधल (कांधलोत) राठौड़ कहलाते हैं। कांधल जी अपने समय के बड़े वीर योद्धा थे। पिता रणमल के चित्तौड़ में मारे जाने पर राठौड़ों को विपत्तियों का सामना करना पड़ा। उन विपत्तियों के दिनों में कांधल अपने भाई राव जोधा का साथ देकर राठौड़ राज्य की पुनः स्थापना की। विक्रम संवत् 1522 के दशहरा उत्सव के अवसर पर कांधल जी अपने भतीजे राव बीका जी के साथ टहल रहे थे, तो राव जोधा जी ने मजाक में कहा कि "लगता है कांधल अपने भतीजे को कोई नया राज्य दिलवेंगे"। यह बात कांधल जी और राव बीका को चुभ गई और फिर दोनों काका-भतीजा जोधपुर से रवाना हो गए तथा चाडासर आदि स्थानों को जीतकर और जाटों के जनपदों को जीतकर बीकानेर नए राज्य की स्थापना कर दी। राव बीका ने फतेहपुर के नवाब के सेनापति बहुगुणा को मार कर उसके कुछ प्रदेशों पर अधिकार पर बीकानेर राज्य का विस्तार किया। अपने दूसरे भतीजे बीदा को कांधल जी ने छापर - द्रोणपुर जीतने में पुरी मदद की और शाही सेनापति सारंगखां को युद्ध-भूमि से भगा दिया। इस समय कांधल जी की आयु 70 वर्ष थी, परन्तु फिर भी उनमें अदम्य साहस था। सांरगखां ने बाद में बड़ी सेना लाकर फिर आक्रमण किया, तब कांधल जी फिर युद्ध करने गए। तब युद्ध में घोड़े का तंग टूट जाने के कारण उन्हें नीचे उतरना पड़ा और ऐसी स्थिति में सारंगखां ने प्रबल आक्रमण किया। कांधल जी वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये। कांधल जी के बड़े पुत्र बाघ थे। बाघ जी के तीन पुत्र थे - बणीर, नारायणदास (ठि. धमोरा) और रायमल। रायमल के वंशज रायमलोत कांधल कहलाते हैं, इनके वंशज रोहतक के पास डम्माणा गांव में बसते हैं।

कांधल राठौड़ों की खांपे (शाखाएं):-

1). रावतोत कांधल (कांधलोत) - रावत कांधल जी के दूसरे पुत्र का नाम राजसिंह था। कांधल जी की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र बाघ सिंहजी की भी शीघ्र मृत्यु हो गई थी तथा बाघसिंह का पुत्र बणीर अल्पायु था। इस कारण राजसिंह को पिता की पर्ववत पदवी मिली तथा राजासर का ठिकाना मिला। राजासर बीकानेर के प्रमुख चार रियासत ठिकानों में से एक था। यही राजासर बाद में रावतसर कहा जाने लगा। 'रावत' पदवी के कारण राजसिंह के वंशज रावतोत कहलाए। कामरां द्वारा बीकानेर पर आक्रमण करने के समय राजसिंह के पुत्र किशनसिंह ने वीरता प्रर्दशित की, किशनसिंह का पुत्र उदयसिंह था। किशनसिंह को जैतपुर का ठिकाना मिला था। अकबर के समय गुजरात पर आक्रमण करने के समय राघवदास के पुत्र उदयसिंह (रावतसर) ने वीरता दिखाई तथा उदयसिंह के पुत्र जगतसिंह ने वीरगति प्राप्त की। राघवदास के बाद क्रमशः रामसिंह, लखधीरसिंह, चतरसिंह, आनंदसिंह, जयसिंह, हिम्मतसिंह, विजयसिंह, भोमसिंह, नाहरसिंह, जोरावरसिंह, रणजीतसिंह, हुकुमसिंह, मानसिंह तथा तेजसिंह रावतसर की गद्दी पर बैठे। तेजसिंह की रानी लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत राजस्थान की जानी-मानी विदुषी है। यह राजस्थान के विधानसभा की सदस्या भी रही है।
रावतसर के किशनसिंह को बीकानेर के महाराजा कल्याणमल ने दौलड़ी ताजीम का ठिकाना जैतपुर दिया था। गजसिंह के समय उनके बड़े भाई अमरसिंह जोधपुर की सेना को बीकानेर पर चढ़ा लाए। उस समय जैतपुर के ठाकुर स्वरूपसिंह ने बरछे से वारकर जोधपुर सेना के सेनानायक रतनचंद्र भण्डारी को मार डाला। यहां के स्वामी सरदार सिंह ने सूरतगढ़ बसाने के समय भट्टियों का दमन किया तथा सुरक्षा के लिए फतेहगढ़ का निर्माण करवाया। इन ठिकानों के अलावा खुंई (इकलड़ी ताजीम), माहेल (सादी ताजीम), कालासर आदि रावतोतों के ठिकाने थे। रावतसर के राघवदास के वंशज राघवदासोत भी कहलाते हैं। राघवदासोतों के बीकानेर रियासत में बिसरासर (इकलड़ी ताजीम) व घांघूसर (सादी ताजीम) के ठिकाने थे।

2). सांईदासोत कांधल (कांधलोत) - कांधलजी के पुत्र अरड़कमल को साहवा का ठिकाना मिला। नैणसी री ख्यात में लिखा है कि अरड़कमल भटनेर दौड़े तथा जीतकर लौटे। कामरा़ं ने जब भटनेर पर आक्रमण किया तब भटनेर का किला अरड़कमल के पुत्र खेतसी के अधिकार में था। कामरां ने खेतसी को अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा, परन्तु खेतसी ने अधीनता स्वीकार नहीं की और मुगलों को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच युद्ध शुरू हो गया। मुगल जब किले पर चढ़ने का प्रयास करने लगे तो वीर राजपूत की तरह खेतसी नंगी तलवार लिए किले से बाहर आकर शत्रु दल पर टूट पड़े और राजपूती शौर्य के साथ वीरगति को प्राप्त हो गए। इसके बाद कामरा़ं बीकानेर पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा। बीकानेर के साथ हुए युद्ध में खेतसी के पुत्र सांईदास कामरां के विरुद्ध लड़े। इसी सांईदास के वंशज सांईदासोत कांधल (कांधलोत) कहलाते हैं। सांईदास के सात पुत्रों में से केवल तीन पुत्रों का ही वंश चला। पहले जयमलजी ठिकाना साहवा, दूसरे कानसिंह ठिकाना गुणा तथा तीसरे खंगारसिंह ठिकाना सिकरोड़ी।
सांईदास के वंशज क्रमशः जयमल, आसकरण, हरीसिंह, दौलतसिंह, व लालसिंह को जोरावर सिंह ने बीकानेर में भादरा की जागीर दी। लालसिंह अपने समय के स्वाभीमानी तथा वीर राजपूत थे। लालसिंह बीकानेर नरेश के विद्रोही हो गये थे, वे बीकानेर के लिए सिरदर्द बन गए थे, तब जोरावर सिंह ने जयपुर की सहायता ली तो शार्दुलसिंह शेखावत ने लालसिंह को पकड़ कर नाहरगढ़ में रखा। सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद जोधपुर राजा ने उन्हें छुड़वाया। बाद में बड़ी मुश्किल से बीकानेर के महाराजा गजसिंह ने उनके अपराध क्षमा करके भादरा वापस सौंप दिया। महाराज सूरतसिंह ने उनके वंशजों से भादरा ठिकाना छिन लिया। महाराज सरदारसिंह ने उनके वंशजों को माणकरासर की जागीर दी। इन्हीं भादरा ठिकाने के लालसिंह के वंशज लालसिंहोत कांधल राठौड़ भी कहलाते हैं। इनके वंशज झाडसर कांधलान, झांझणी आदि गांवों में हैं।
लालसिंहोतों के अलावा सांईदासोत कांधल के वंशज सांवलसर, सिकरौड़ी, साहवा, तारानगर, रेड़ी, साहरण आदि गांवों में निवास करते हैं।
कांधल जी के पुत्र अरड़कमल जी के वंशजों के पास मालवा जिला साजापुर में गुणबंदी तथा तन्नौड़िया ठिकाने थे।

3). कांधल जी के पुत्र पूर्णमल जी के वंशज पूर्णमलोत कांधल राठौड़ कहलाते हैं। इनके वंशज बिल्यू(चुरू) में है।

4). परवतोत कांधल राठौड़ - कांधल जी के पुत्र परवत के वंशज परवतोत कांधल राठौड़ कहलाते हैं। इनकी एक कोटड़ी बिल्यू में बताई जाती है

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